वह कहानी नहीं होती

इश्क के पर्चे में भूगोल और इतिहास मिल कर जब समाजशास्त्र से गुणा-भाग होते हैं तो संज्ञा, सर्वनाम, काल, संधि, प्रत्यय, समास, अलंकार  विशेषण, वचन, मुहावरे और पर्यायवाची सब मिलकर 'एक' का आसान सा पहाड़ा पढ़ते हैं जो पूरा होते ही रसायनशास्त्र के सबसे कठिन सूत्र में परिवर्तित हो जाता है और केवल जीवविज्ञान पढ़े बेचारे प्रेमियों की समझ से एकदम बाहर हो जाता है !

वे हैरान,परेशान से एकदूसरे का मुंह ताकते सारा समय निकाल देते हैं कि कैसे भी करके गीत, संगीत,नाटक, अभिनय, खेल, कूद या चित्रकारी आदि विषयों का सहारा लेकर एक-आध प्रश्न का उत्तर लिख दें.

लेकिन सब व्यर्थ हो जाता है !

और अंत में बीस प्रतिशत तो परीक्षा ही छोड़ देते हैं , बीस प्रतिशत फेल हो जाते हैं बाकि बचे बीस फिर से तैयारी करते हैं , बीस प्रतिशत की बैक लगती है, दस प्रतिशत विषयों को समझने के लिए ट्यूशन लगाते हैं , पाँच प्रतिशत अयोग्य घोषित हो जाते हैं , चार प्रतिशत विषय बदल लेते हैं और केवल एक प्रतिशत पास हो पाते हैं , और उस एक प्रतिशत के भी निन्यानवे दशमलव नौ प्रतिशत तो केवल सपने में !

मतलब कि कुल मिलाकर इश्क के पर्चे की यह कहानी अधूरी ही रह जाती है !

और जो पूरी हो जाती है , वह कहानी नहीं होती !


तारीख: 26.09.2020                                                        सुजाता






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