पाताल लोक-समीक्षा

 

गर्मी की शाम, बिना बिजली का गांव और द्वार पर पंखा झेलते बाबूजी। बीच-बीच मे कभी कभार 'चिस्स' की आवाज़ के साथ सलाई जलती और मुट्ठी में बीड़ी सुलगाते हुए बाबूजी मच्छरों को नर्क से भी घिनौनी गालियां देते। द्वार बड़ा था, तो ऐसे कई लोग जिनके पास द्वार नही था वो हमारे ही द्वार पर आकर बैठे रहते थे। ऐसे में कई किस्से-कहानियाँ खुलते, कहानियाँ उनकी जो एक बार मे 2 किलो आटें की रोटी खा जाए, कहानियाँ ऐसे चोरो की जिन्होंने राह चलते लोगो के कपड़े उतरवाए, कहनियाँ उन बैल और हलवाहों की जो हफ़्तों खेत-बधार से घर नही आए।

Pataal lok web series review

ये सारी कहानियाँ कहने को तो बस एक किस्सा हैं लेकिन इसे कहानी बनाया इसके किरदारों ने, वो किरदार जिन्होंने उस दो किलो आटें की रोटियां बेली, वो किरदार जिनके कपड़े उतरे, वो किरदार जिनके घर पर बैलों की नादी में चारा और थाली का अन्न सूख गया इंतजार में। इस एक किस्से को सुनने में हमे कहानी बनना पड़ता है, हर उस किरदार के साथ जो उसमे मौजूद है, अगर एक भी छुटा मतलब किस्सा छुटा, कहानी छुटी।

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ऐसा ही एक किस्सा आया है हमारे आधुनिक द्वार Amazon Prime Video पर, नाम है "पाताल लोक।" किस्सा सुनाया है सुदीप शर्मा ने, मुख्य किरदार हैं 'हाथीराम चौधरी'(जयदीप अहलावत)। इस एक किरदार के नीचे सुदीप जी ने पाताल लोक और ऊपर स्वर्ग लोक को बसाया है। किस्सा धरती पर रहने वाले हाथीराम को अपने जीवन मे मिले शायद उस इकलौते अवसर का है जो उसे बेवकूफ़ समझ कर थमाया गया था। किस्से को कहानी बनाया उन चार किरदारों ने जो पाताल लोक से निकल कर धरती पर आ गए हैं। ये चार लोग हैं - चीनी (रोनाल्डो सिंह), तोप सिंह (जगजीत संधू), कबीर (आसिफ खान) और हथौड़ा त्यागी (अभिषेक बनर्जी)।

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कहानी वंहा शुरू होती है जहां पाताल लोक से निकले ये कीड़े धरती पर सीढ़ी लगा कर स्वर्गवासियों को काटना शुरू करते हैं, और स्वर्ग में रहने वाले देवता संजीव मेहरा(नीरज कबि) को पहले इंसान फिर आहिस्ता-आहिस्ता राक्षस होने पर मजबूर करती है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है वैसे ही इसके किरदार भी बदलते हैं, कोई कहीं इंसान से देवता तो कहीं राक्षस से इंसान बन रहा है और ये निर्णय लेने का काम निर्देशक ने बखूबी से दर्शकों पर छोड़ दिया है की आप किस किरदार को कहानी के साथ किस रूप में देख रहे हैं।


बात और करें अगर कहानी की तो ये टिकी तो एक धुरी पर है लेकिन घूमती अनन्य दिशाओं में है। व्यक्तिगत तौर पर ये कहानी हाल के समयों में भारत मे बनी अन्य वेब सिरीज़ से ऊपर है। इसमे एक तरफ नृशंस हत्याएं है तो दूसरी तरफ निश्चल अधूरा प्रेम, एक तरफ जातिवाद में हो रहा वहाशिपना है तो दूसरी तरफ स्वर्ग लोक में हो रहे षड्यंत्र की बर्बरता। आसान भाषा मे कहें तो इसमें परत दर परत एक किस्सा है, किस्सा हर उस किरदार का जो जूझ रहा है उस खून के पीछे जिसे अंजाम ही न दिया गया। किस्सा उन लोगों का जिन्होंने हर किरदार को एक पहचान दी, किसीको भगौड़ा बनाया, किसीको चोर, किसीको मजबूर और किसीको हिरण्यकश्यप।

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हाथीराम चौधरी के किरदार में जयदीप अहलावत ने अपने दर्शकों को दिखाया है कि वो आज भी वही शाहिद खान (गैंग्स ऑफ वस्सेपुर) हैं, वो शाहिद खान जिसने अपने भीगे बदन और काँपते हाथों से मरी हुई बीवी के बच्चे को गोद मे लेने के बाद आंखों से एक बूंद भी नही बहाया। 


हाथीराम वो किरदार है जो थकता है तो कमर पकड़ कर उठता है, चोट लगने पर इस कदर लंगड़ाता है कि देखने वाले की टांगो में दर्द हो जाये। व्यक्तिगत रूप से जयदीप जी के लिए "पाताल लोक" धरती पर वो अवसर है जिसे भारतीय सिनेमा के स्वर्ग लोक ने उन्हें अभी तक नही दिया।

 

जयदीप जी की तरह बाकी कलाकारों ने भी अपने किरदारों को जबरदस्त तरीके से निभाया है, विशेष तौर पर हथौड़ा त्यागी के किरदार में अभिषेक बनर्जी जिन्हें संभवतः बस मिनट भर का संवाद मिला है लेकिन उनका चेहरा बोलता है। चेहरा वो की शांत बैठे हथौड़ा त्यागी की आंखे आपकी आत्मा में घुस जाए, या फिर आंखे वो जो सिद्धार्थ चौधरी (बोधिसत्व शर्मा) अपने पिता से मार खाते वक़्त दिखाता है।

Hathoda tyagi Abhishek bannerjee

बात करें अगर नीरज कबि के किरदार की तो शायद इस प्रतिभाशाली कलाकार को अपना कौशल दिखाने के भरपूर अवसर नही दिया गया है, ठीक यही सवाल उठता है अंकुर विकल के किरदार को लेकर जिन्हें बमुश्किल दो एपिसोड तक सीमित रखा है। लेकिन इन सभी कलाकारों ने चंद मिनट, सेकंड या घंटे भर के भी स्क्रीन टाइम में अपना भरपूर पेश किया है। विशेष तौर पर जुझारू पत्रकार अमितोष त्रिपाठी का किरदार निभा रहे श्रीधर दुबे और इमरान अंसारी के मासूम चेहरे वाला किरदार निभा रहे ईश्वाक सिंह का काम सराहनीय है।

Neeraj Kabi
कलाकरो के चयन में निर्देशक ने काफी चपलता से काम लिया है, जैसे जो किरदार जिस पृष्ठभूमि से संबंध रखता है उसे निभाने वाले कलाकार उसी पृष्ठभूमि से संबंध रखता है। उल्लेखनीय है चीनी का किरदार निभा रहे रोनाल्डो सिंह का के बोल-चाल पर नेपाली भाषा का प्रभाव या फिर डॉली के किरदार में स्वास्तिका मुखर्जी का हिंदी में बांग्ला घोलना।

अंत मे 'पाताल लोक' की कहानी अगर आप किसी से पूछे तो बिल्कुल आसान है शायद कुछ चंद मिनट लगेंगे आपको किसीको सुनाने/समझाने में। लेकिन उन किस्सों का क्या जिन्हें हम इस चंद मिनटों छोड़ आये, जिन्होंने इसे असल मे कहानी बनाया?
उत्तर है- ये किस्से, उनके घटनाक्रम, और उनमें हो रहे अपराधों के इर्द-गिर्द घूम रहे रहस्य, जिन्हें एपिसोड दर एपिसोड बाँधा गया है। वो एपिसोड जिसके बिना ये कहानी, कहानी नही है।

Pataal lok

तो जाइये द्वार पर और इस कहानी को सीने में भरिये, अंग्रेज़ी में Binge Watch कीजिये। 
ध्यान रहे, गर एक भी किरदार नजर से छुटा मतलब 'किस्सा छुटा, कहानी छुटी।'

 


तारीख: 20.05.2020                                                        अंकित मिश्रा






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