भारतीय फ़ुट्बॉल के स्वर्णिम युग का सबसे चमकदार सितारा नहीं रहा

 3 September 1962 की रात- डिनर हो चुका था और खिलाड़ियों को नींद नहीं आ रही थी । चुन्नी गोस्वामी, जरनैल सिंह, अरुण घोष, बालाराम आदि यूँ ही टहलने स्टेडीयम की ओर निकल पड़े। दूर अंधेरे में एक लौ सी दिखायी दी। खिलाड़ी जब वहाँ पहुँचे तो देखा रहीम साहब सिगरेट सुलगाए बैठे हैं। उन्होंने खिलाड़ियों को इशारे से अपने पास बैठने को कहा और सिगरेट की एक कश लेते हुए बोले 

 

“तुम लोगों से कल एक तोहफ़ा चाहिए। कल सोना लेकर आना”

 

खिलाड़ियों ने अपने कोच सैयद अब्दुल रहीम (जिन्हें सब रहीम साब बुलाते थे) को पहले इतना भावुक कभी नहीं देखा।  रहीम साहब यूँ बात कर रहे थे जैसे ये उनकी अंतिम ख़्वाहिश हो। उस रात न तो कोच न ही खिलाड़ियों को नींद आयी।

 

और नींद आती भी कैसे? जब आप ये जानते हों कि एशियन गेम्ज़ के फ़ुट्बॉल गोल्ड मेडल के लिए मुक़ाबला साउथ कोरिया से है जिन्हें आपने आज तक नहीं हराया और पिछली मर्तबा सेमी-फ़ाइनल उन्ही से हार चुके थे । नींद आती भी कैसे? जब आप ये जानते हों कि सबसे पहले क्वालिफ़ाई करने के बावजूद खेल शुरू होने के 2 हफ़्ते पहले तक टीम का एशियन गेम्ज़ में भाग लेना निश्चित नहीं था क्योंकि देश में आर्थिक संकट था और फ़ुट्बॉल टीम पर “पैसे बर्बाद” करने का कोई तुक नहीं था। नींद आती भी कैसे जब ये मालूम हो कि  स्टेडीयम में पहचने से पहले ही आपके साथ ऐसा व्यवहार होगा जैसा कोई देश दुश्मन सेना के साथ करती हो।

 

indian football team asian games 1962

 

 दरअसल, इन एशियन गेम्ज़ में मेज़बान देश  इंडोनेशिया ने राजनीतिक कारणों से इज़राइल और ताइवान के खिलाड़ियों को वीज़ा देने से इनकार  कर दिया था जिसकी आलोचना दुनिया के कई देशों ने किया था। भारतीय ओलम्पिक संघ के सदस्य G L सोंढी ने कहा था कि इन खेलो को “जाकार्ता एशियन खेल” न कह कर सिर्फ़ “जाकार्ता खेल’ कहना उचित होगा। फिर क्या था। इस मामले ने ऐसा तूल पकड़ा कि भारत और भारतीय खिलाड़ी इंडोनेशिया में दुश्मन की तरह देखे जाने लगे। एक भीड़ ने तो भारतीय दूतावास में पहुँच कर ख़ूब तोड़-फोड़ भी मचाई। भारतीय बस पर पथराव तो इतनी बार हुआ की जरनैल सिंह अपनी पगड़ी छुपाने के लिए बस के फ़र्श पर बैठकर सफ़र करने लगे।

 

ख़ैर, 4 September को जब भारतीय टीम मैदान में उतरी तो सामने पहाड़ सा एक लक्ष्य था। एक तो दुश्मन सा बर्ताव करने वाले दर्शक ऊपर से घायल टीम। पीटर तंगराज इनफ़्लुएंज़ा की बुखार से पूरी तरह ठीक भी नहीं हुए थे लेकिन रहीम साहब ने सोचा की ये 6 फूट 3 इंच लम्बा गोलकीपर नाटे कोरियंस के सामने एक मनोवैज्ञानिक फ़ायदा तो ज़रूर पहुँचा देगा। राइट बैक त्रिलोक सिंह पैर में अंगूठे के टूटे नाख़ून के साथ खेलता रहा। जरनैल सिंह मैच ख़त्म होने तक अपने सर पर लगे चोट से निकलते ख़ून से लथपथ थे।  इन सब के ऊपर दक्षिण कोरिया की अजेय सी दिखने वाली टीम। लेकिन रहीम साहब क्या कोई मामूली जादूगर थे? साठ  के दशक से 4-2-4 का फ़ॉर्मेशन रखने वाला यह कोच पूरी दुनिया में वाह-वाही  बटोर चुका था। इनके तरकश में अब भी कई तीर थे।

 

पारम्परिक 2-3-5 के फ़ॉर्मेशन में खेलने वाले देश के सामने रहीम साहब ने 3-3-4 फ़ॉर्मेशन बना दी। यूसुफ़ खान को फिर “withdrawn फ़ॉर्वर्ड” के तरह खेलाया। आम तौर पर “सेंटर बैक” खेलने वाले जरनैल सिंह को “बस्लिंग सेंटर फ़ॉर्वर्ड” खिलाया। 1 लाख दर्शकों के बीच खेल शुरू हुआ।दर्शक जैसे भारतीय खिलाड़ियों को खा जाएँ- भारतीय हाफ़ में आने वाला हरेक क्षण चीयर किया जा रहा था जबकि भारतीय खिलाड़ियों का हरेक शॉट मैदान में सन्नाटा बिखेर दे रहा था। मैदान में बैठा सिर्फ़ एक समूह था जो भारत के साथ था- पाकिस्तानी हॉकी टीम जिसने 2 दिन पहले भारत हो हरा गोल्ड मेडल जीता था। 

 

उस दिन भारतीय खिलाड़ियों का कोर्डिनेशन लाजवाब था। गोस्वामी और बालाराम तो एक दूसरे को ऐसे पास दे रहे थे जैसे मानों टेबल  पर बैठे एक दूसरे से बातें कर रहे हों। खेल का 17 मिनट बीत चुका था। लेफ़्ट विंग पर बालाराम को गेंद मिली जो उन्होंने  तेज़ी से आगे आते हुए पेनल्टी बॉक्स में चुन्नी गोस्वामी को पास कर दिया। गोस्वामी पर 2 डिफ़ेंडर झपटे। लेकिन उन्होंने देख लिया था कि दाहिनी ओर पीके बनर्जी हवा की रफ़्तार से आगे बढ़ रहे थे।गोस्वामी ने डिफ़ेंडर को छकाते हुए बॉल को हल्के से दाहिनी ओर खिसका दिया जो पीके के प्रहार से गोल-पोस्ट के अंदर जाकर ही रुकी। भारत ने मैच में बढ़त बना ली थी। स्टेडीयम लगभग शांत था। फिर क्या था 3 मिनट के बाद फ़्रैंको के फ़्री किक को जरनैल सिंह से पेनल्टी बॉक्स में शानदार “लेफ़्ट फ़ुटर” से गोल में तब्दील कर दिया। भारत का अटैक जारी रहा हालाँकि अब कोरियन डिफ़ेन्स अधिक मुस्तैद था। धीरे धीरे ही सही मैच और दर्शकों का समर्थन भारत की ओर झुकने लगा। इसलिए जब पहले हाफ़ के आख़िरी लमहों में यून-ओक-चो के दमदार किक को तंगराज ने अपनी बायीं ओर लगभग उड़ते हुए गोल के अंदर जाने से रोका तो अब तक दुश्मन जैसा बर्ताव करने वाले दर्शक भी ख़ुद को ताली बजाने से नहीं रोक पाएँ। 

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दूसरे हाफ़ में भी कमोवेश यही सिलसिला चला लेकिन शायद बाज़ी एक आख़िरी बार पलटना चाहती थी। अभी खेल के सिर्फ़ 5 मिनट बचे थे। क्यूँग-हुआ-पार्क के क्रॉस पर चा-ताई-सुंग के हेडर को तंगराज गोल्पोस्ट में जाने से रोक नहीं पाए। अचानक सबको पुराने मैच याद आने लगे। याद आने लगा 1956 मेल्बर्न ओलम्पिक में फ़ुट्बॉल में मेडल आख़िरी क्षणों में हाथ से निकाल जाना जब सेमीफ़ाइनल में 1-0 से आगे चल रही भारतीय टीम आख़िरी 20 मिनट्स में 4 गोल खा युगोस्लविया से अपना मैच गवाँ बैठी। याद आया 1960 ओलम्पिक का फ़्रान्स के साथ हुआ मैच भी जब 1-1 से बराबरी पर चल रही टीम, पहले तो 2 पेनल्टी चूक गयी और फिर  मैच के आख़िरी मिनट पर गोल खा मैच हार बैठी। उस समय भारत में 70 मिनट के मैच होते थे जबकि इंटर्नैशनल मैच 90 मिनट के। इसलिए आख़िरी कुछ मिनट में गोल खा लेना आम बात था।

 

 

लेकिन 4 september 1962 का दिन आम नहीं था। ये ख़ास दिन था। और इस दिन तो कुछ ख़ास ही होना था। मैच 2-1 पर समाप्त हुआ। भारत को फ़ुट्बॉल में गोल्ड मिला। रहीम साहब की अंतिम ख़्वाहिश चुन्नी गोस्वामी और उनकी टीम ने पूरी की। शायद रहीम साहब को छोड़ कोई और नहीं जनता था उस वक़्त कि ये वाक़ई उनकी अंतिम इच्छा होगी। इस ऐतिहासिक दिन के 9 महीने के भीतर कैन्सर से रहीम साहब का देहांत हो गया।

 

 क़रीब 60 साल हो गए लेकिन ये या ऐसा कोई करिश्मा फिर नहीं हो सका। लेकिन ऐसी टीम, ऐसे लोग भी तो फिर नहीं हो सके। ये वो दौर था जब भारत ओलम्पिक में क्वालिफ़ाई किया करता था। एशियन  लेवल पर जीतना आम था, 1950 के वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफ़ाई किया। 60 के दशक में जब लेस्टर सिटी के विरुद्ध खेलने के लिए एशिया टीम चुनी गयी तो उसमें 5 भारतीय खिलाड़ी थे। रहीम जैसे कोच जिनका घरेलू मैचेज़ में जीत का प्रतिशत 62% था। शैलेंद्र मन्ना, पी के बनर्जी और बालाराम जैसे खिलाड़ी और चुन्नी गोस्वामी जैसे हरफ़नमौला कप्तान । चुन्नी गोस्वामी जो 8 साल की उम्र में जो मोहन बाग़ान से जुड़े तो ताउम्र किसी और क्लब के लिए नहीं खेले। यहाँ तक ही टोटेनहम होत्सपर्स के लिए खेलने का ऑफ़र भी ठुकरा दिया। यही नहीं, जब फ़ुट्बॉल से मन भरा तो क्रिकेट खेलने लगे- उसमें भी एक ऑल राउंडर की हैसियत से। 2 बार बंगाल की ओर से खेलते हुए रणजी ट्रोफ़ी फ़ाइनल भी खेला 

 

30 April 2020 को सुबिमल गोस्वामी जिन्हें प्यार से सभी चुन्नी कहते थे, ने दुनिया के मैदान से सन्यास ले लिया। आज की जेनरेशन शायद उम्मीद ही कर सकती है की इस ख़ूबसूरत खेल में भारत का वो दबदबा हो सके जो चुन्नी गोस्वामी ने कभी कल्पना की थी। 

 


तारीख: 05.05.2020                                                        कुणाल






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