मैं एक मुसाफ़िर कारवां में उलझा

मैं एक मुसाफ़िर कारवां में उलझा,
तुम इस सफ़र का कोई पड़ाव हो,

जहां मेरे छालों का इलाज़ है।

रुको, मेरे जूतें जरा आहिस्ता निकालों,
इसमे खून है, ज़ख्म है,

शायद छालों से भी बड़ा कोई घाव है।


तारीख: 20.05.2020                                                        अंकित मिश्रा






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