मन का उपवन

तुम आए तो

मन का उपवन

महक गया।

 

उड़ने लगीं

तितलियाँ सुख की, 

खिले कमल

पाकर तुम्हें

थिरकता रहता

मन चंचल

 

प्रेम-गंध पा 

मुग्ध भ्रमर - मन 

बहक गया।

 

कुछ खुशबू,

कुछ रंग प्यार के, 

गये बरस 

सारा जीवन 

मधुमय होकर 

हुआ सरस 

 

सुर्ख गुलाब 

खिला चेहरे पर 

दहक गया


तारीख: 14.05.2020                                                        त्रिलोक सिंह ठकुरेला






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है