कब तक पुकारूँ

दंगों/समुदायों की कसमसाहट पर तीखा आख्यान; करनट–ठाकुर टकराव का मानवीय दस्तावेज़

 

प्रस्तावना


1957 में प्रकाशित ‘कब तक पुकारूँ’ रांगेय राघव का वह उपन्यास है जिसमें उत्तर भारत के एक सीमांत ग्रामीण भू-भाग—‘बैर’ (राजस्थान–उत्तर प्रदेश की सरहद)—को वे समाजशास्त्रीय संवेदना के साथ पकड़ते हैं। कथा का केन्द्रीय समुदाय है करनट/नट—औपनिवेशिक दौर में ‘जरायम-पेशा’ ठहराए गए, आज जिनका एक बड़ा हिस्सा विमुक्त/घुमंतू/अर्ध-घुमंतू (DNT/NT/SNT) समुदायों में गिना जाता है। उपन्यास इसी समुदाय और आसपास के ठाकुर–पुलिस–नगरिया सत्ता से उसके रोज़मर्रा टकराव का गहन चित्र है—जहाँ टकराहटें कई बार दंगे-सरीखी हिंसा में फूटती हैं।

 

कथाभूमि और समय की धड़कन


कथा-स्थल बैर (Bair)—भरतपुर (राजस्थान) की तरफ़, पर सांस्कृतिक रूप से गंगापार/दोआबा की परिधि से जुड़ा—एक ऐसा गाँव-पट्टी है जहाँ नटों/करनटों की बस्ती, ठाकुरों के खेत और बाज़ार/थाने की ‘नयी’ सत्ता साथ-साथ साँस लेती है। रज़ाकारों/पुलिस/ठाकुरों के साथ करनट स्त्रियों का शोषण, और बदले में करनट पुरूषों की उग्र प्रतिक्रियाएँ—यह सब मिलकर ‘स्थानीय दंगे’ या झुंड–हिंसा के दृश्य रचते हैं। Penguin/अमेज़न के उत्पाद-विवरणों से लेकर हिन्दी ज्ञानकोशीय प्रविष्टियाँ तक कहानी की यह आंचलिक भौगोलिकता और जातीय-सामुदायिक तनाव रेखांकित करती हैं।

 

कथासार: ‘सुखराम करनट’ की आँख से समाज


उपन्यास का नाभिक है सुखराम करनट—“अवैध-संबंध से जन्मा” युवक, जिसके भीतर गौरव–विद्रोह साथ रहते हैं। वह अपने ‘ख़ून’ और ‘हक़’ की तलाश में कभी ठाकुर बनने का ख़्वाब देखता है, कभी करनट नियति से लड़ता है। उसके इर्द-गिर्द घूमती हैं दो मार्मिक स्त्री-कथाएँ—प्यारी और कजरी—और एक उपकथा चंदा–सूसन–लॉरेन्स की (औपनिवेशिक छाया, नस्ल-और-वर्ग का तनाव)। सुखराम की पत्नी प्यारी पुलिस/ठाकुर सत्ता के बीच यौन-शोषण की शिकार बनती है; कजरी सुखराम के साथ खड़ी होकर भी अपने हिस्से की अस्मिता तलाशती है; चंदा (अंग्रेज़ औरत सूसन की बेटी) की त्रासदी इस सीमांत समाज के ‘मिश्रण’ और ‘वर्जना’ की रेखाएँ गहरी करती है। यह सब एक साथ मिलकर ‘समाज बनाम व्यक्ति’ नहीं, बल्कि समुदाय बनाम समुदाय और राज्य बनाम हाशिया की बहु-स्तरीय भिड़ंत रचते हैं।
राघव इस भू-दृश्य में करनट स्त्रियों के श्रम/शरीर के ‘व्यापार’ को नैतिकता का आदर्श बनाकर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक–औपनिवेशिक ढाँचे (थाना, पुलिस, क़ानून) और स्थानीय प्रभुत्व (ठाकुर, जमींदार, मालिक) की संगति में पढ़ते हैं—जिससे ‘पीड़ित’ और ‘अपराधी’ की रेखाएँ कई बार उलट जाती हैं। यह वैसा ही “अँचलिक” आख्यान है जिसमें नैतिकता बनाम जीविका का द्वन्द्व, क़ानून की ‘निष्पक्षता’ पर प्रश्न, और सामुदायिकता का क्रूर दबाव सब साथ चलते हैं।

 

पात्र-परिचय (संक्षेप, पर उभरे हुए)


•  सुखराम करनट: उपन्यास का केंद्र; ‘अधूरा क़िला’ उसके भीतर की उच्च-वर्गीय आकांक्षा (ठाकुराना सम्मान) और हाशिये की छटपटाहट का रूपक है। वह शोषण पर खुलकर प्रतिवाद करता है—पर उसी प्रतिवाद में आक्रोश–अस्मिता–अपराध की रेखाएँ घुल-मिल जाती हैं।
•  प्यारी: करनट स्त्री-जीवन की त्रासदी का चेहरा; पुलिस/ठाकुर सत्ता के बीच शरीर-राजनीति की मार झेलती है; उसका चरित्र करनट स्त्रियों पर यौन–आर्थिक शोषण का ‘केस-स्टडी’ है।
•  कजरी: परिस्थितियों से ऊपर उठकर प्रतिष्ठा/ममता के साथ अपने को अभिव्यक्त करती है; ‘भोग्या’ की रूढ़ छवि के बरक्स वह एजेंसी का सूक्ष्म प्रतिमान बनती है।
•  चंदा–सूसन–लॉरेन्स: अंग्रेज़ औरत सूसन की बेटी चंदा (जिसका लालन-पालन सुखराम करता है) और लॉरेन्स की उपकथा औपनिवेशिक और वर्गीय ‘मिश्रण’ के असहज नतीजों पर तेज़ रोशनी फेंकती है।

 

शिल्प और भाषा


राघव आँचलिक यथार्थ और समाजशास्त्रीय दृष्टि को जोड़ते हैं। कथन में पहचान–अधिकार–हिंसा के प्रसंग आते हैं—पर भाषा में वे उक्ति या उपदेश से बचते हैं; संवादों/घटनाओं के जरिए ‘अंदरूनी’ सच्चाइयाँ खुलती हैं। आलोचनात्मक लेखन इस बात की पुष्टि करते हैं कि राघव करनट जीवन-जगत को रोमानी नहीं बनाते, बल्कि श्रम–शरीर–क़ानून की त्रयी में रखकर पढ़ते हैं।

 

विषय-वस्तु: दंगे/झुंड-हिंसा, राज्य–समुदाय, स्त्री-स्वायत्तता


•  दंगे/झुंड-हिंसा का सूक्ष्म समाजशास्त्र
यहाँ दंगा किसी ‘दो धर्मों’ का नहीं, बल्कि समुदाय बनाम समुदाय (करनट–ठाकुर), और कई बार राज्य बनाम हाशिया (पुलिस–करनट) का रूप लेता है। यह हिंसा ‘इज्‍ज़त’, ‘हक़’, ‘मर्दानगी’, ‘नैतिकता’ जैसे शब्दों में पनपती है—औरतों के शरीर को दंड/प्रतिष्ठा के औज़ार में बदल देती है। यह रचना हमें बताती है कि संरचनात्मक हिंसा के बिना स्थानीय दंगा-राजनीति को समझना अधूरा है।
•  राज्य–क़ानून की वैधता बनाम सामुदायिक न्याय
करनटों को ऐतिहासिक रूप से ‘अपराधी’ बता कर निरन्तर निगरानी/पंजीकरण में रखने वाले औपनिवेशिक क़ायदे—जिनके ‘डी-नोटिफ़िकेशन’ के बाद भी Habitual Offenders कानूनों से उनका अविश्वास बना रहा—उपन्यास की पृष्ठभूमि हैं। यह संदर्भ बताता है कि ‘क़ानून’ किस तरह सामाजिक पूर्वाग्रह से सना हुआ हो सकता है और कैसे पुलिस–ठाकुर–दफ्तर की मिलीभगत हाशिये को कुचलती रहती है।
•  स्त्री-देह, श्रम और एजेंसी
प्यारी/कजरी जैसी स्त्रियाँ ‘काम–देह’ के दोहरे शोषण से घिरी हैं; पर कजरी का व्यक्तित्व राघव के यहाँ प्रतिरोध और स्वायत्तता के सूक्ष्म बिम्ब रचता है। यह उपन्यास ‘नैतिकता’ को जीविका/सत्ता के सन्दर्भ में पुनर्परिभाषित करता है—और करनट स्त्रियों के अनुभवों को सामुदायिक गरिमा की शर्त बनाकर सामने लाता है।

 

आलोचनात्मक ग्रहण


हिन्दी के अँचलिक उपन्यासों पर लिखने वाले अध्येताओं ने ‘कब तक पुकारूँ’ को “लोक–संघर्ष का सजीव दस्तावेज़” कहा है—जहाँ प्रकृति-परिदृश्य, बोली-बानी और जातीय–वर्गीय सत्ता का जाल एक साथ खुलता है। कई विवेचन इस बात पर भी जोर देते हैं कि उपन्यास कई पीढ़ियों/उपकथाओं को जोड़ते हुए ‘समाजशास्त्रीय रचना’ बनता है—कहीं-कहीं अतिविस्तार का एहसास भी—पर इससे समुदाय-अध्ययन का विस्तार घटता नहीं।

लेखक-ट्रिविया: रांगेय राघव (1923–1962)


राघव का मूल नाम टी.एन.बी. आचार्य (तिरूमल्लै नंबकम् वीरराघव आचार्य) था; जन्म आगरा में, शिक्षा सेंट जॉन्स कॉलेज; बाद में गुरु गोरखनाथ पर पीएच.डी.; जीवन का एक लंबा समय वैर (भरतपुर) और जयपुर में गुज़रा। अल्पायु (39 वर्ष) में ही वे उपन्यास, कहानी, इतिहास–संस्कृति, आलोचना, नाटक, रिपोर्ताज—150+ पुस्तकों के लेखक बने। हिन्दुस्तानी अकादमी (1951), डालमिया (1954), उत्तर प्रदेश सरकार (1957, 1959), राजस्थान साहित्य अकादेमी (1961) समेत अनेक सम्मान मिले; मरणोपरान्त महात्मा गांधी पुरस्कार (1966) का भी उल्लेख मिलता है। उनकी कृतियों में ‘मुर्दों का टीला’ (1948), ‘चीवर’ (1951), ‘अँधेरों के जुगनू’ (1953), ‘धर्त‍ी मेरा घर’ (1961) प्रमुख हैं।

 

रूपान्तरण और सांस्कृतिक प्रभाव


उपन्यास पर दूरदर्शन का धारावाहिक ‘कब तक पुकारूँ’ बना—निर्देशक सुधांशु मिश्रा, निर्माता सुधीर मिश्रा; कलाकारों में पंकज कपूर (सुखराम), पल्लवी जोशी, सुष्मिता मुखर्जी, नीना गुप्ता, संजना कपूर आदि के नाम मिलते हैं। टीवी माध्यम में आने से करनट–ठाकुर टकराव, ‘हाशिए की स्त्री’, और राज्य–समुदाय की बहस घर-घर पहुँची—यह साहित्य से बाहर भी लोक-चर्चा का विषय बना।
इधर Criminal Tribes Act की विरासत पर समकालीन नीति/समाचार लगातार आते रहते हैं—विमुक्त/घुमंतू समुदायों की पहचान, स्मरण-दिवस, आयोग/रिपोर्टें इत्यादि। इस बदलती सार्वजनिक चर्चा के बीच ‘कब तक पुकारूँ’ का पाठ आज ऐतिहासिक साक्ष्य और मौजूदा सामाजिक विमर्श—दोनों में रोशनी देता है।

 

संस्करण–ट्रिविया (एडिशन/पृष्ठ/प्रकाशक)


•  प्रकाशन-वर्ष: 1957.
•  प्रकाशक/संस्करण: राजपाल एंड संज़ व अन्य से कई आवृतियाँ; Penguin/डायमंड/अन्य प्रकाशकों के प्रिंट हाल के वर्षों में आये हैं।
•  आयतन: अलग-अलग संस्करणों में ~440–450 पृष्ठ अंकित; कुछ नये/संक्षिप्त संस्करण 260 पृष्ठ के आस-पास भी सूचीबद्ध हैं—एडिटोरियल ट्रिमिंग/रीसेटिंग के कारण।

 

पाठ-कौशल: इसे कैसे पढ़ें?


•  पहला चक्र—स्थल/समुदाय की “एंट्री”
‘बैर’ का भूगोल, करनट बस्ती, ठाकुर-खेत, थाने की आवाजाही—यहीं उपन्यास का संरचनात्मक सन्दर्भ बनता है; ‘नैतिकता’ का सवाल ‘जीविका/क़ानून’ के साथ कैसे उलझता है, इसे नोट कीजिए।
•  दूसरा चक्र—पात्र-धुरी
सुखराम–प्यारी–कजरी की त्रयी; ‘चंदा–सूसन–लॉरेन्स’ का उप-फलक—इनसे समाज–लिंग–वर्ग का जाल खुलता है; ‘अधूरा क़िला’ रूपक पर विशेष ध्यान।
•  तीसरा चक्र—टकराव/हिंसा/राज्य
ठाकुर–करनट झड़पें, पुलिस–दफ्तर के फ़ैसले, भीड़ की ‘इज़्ज़त-राजनीति’—यहाँ झुंड-हिंसा का समाजशास्त्र पढ़ें; CTA/DNT की पृष्ठभूमि समझने से पाठ और समृद्ध होता है।
•  समकालीन जोड़
आज DNT/NT समुदायों पर नीतिगत/सांस्कृतिक अपडेट देखते हुए इस उपन्यास को “इतिहास+वर्तमान” की तरह पढ़ें—टीवी-रूपान्तरण के अंश/क्लिप्स ढूँढना भी अनुभव को जीवित करता है।

 

क्यों पढ़ें (Reviewer’s Take)


‘कब तक पुकारूँ’ को पढ़ना किसी स्थानीय दंगे की फाइल पढ़ना नहीं है; यह जीवित समाज में हाशिया–केंद्र की घर्षण-भाषा सुनना है—जहाँ क़ानून और नैतिकता दोनों कमज़ोरों के विरुद्ध जाते दिखते हैं, और औरत का श्रम/देह सबसे पहले चोट खाती है। राघव का सौन्दर्यशास्त्र घोषणात्मक नहीं; वे घटनाओं/संवादों से वह सच दिखाते हैं जो आदर्श-भाषणों में ओझल हो जाता है। सुखराम की ‘ठाकुर’ बनने की ललक, प्यारी की बदकिस्मती, कजरी की प्रतिरोधी गरिमा, और चंदा की असह्य त्रासदी—इन सबके बीच उपन्यास एक कठिन बात कहता है: हिंसा किसी एक “अपवाद” का नाम नहीं, संरचना के भीतर पली चीज़ है। इसी से इसका शीर्षक—कब तक पुकारूँ—व्यक्ति की चीख़ नहीं, समुदाय का दीर्घ प्रतिवाद लगता है।
और शायद इसलिए रांगेय राघव प्रेमचन्दोत्तर हिन्दी कथा में एक अलग स्थान बनाते हैं: आँचलिक यथार्थ को वे मानवाधिकार/इतिहास के बड़े परिप्रेक्ष्य से जोड़ते हैं—एक ऐसे सीमांत समाज का लेखा देकर, जिसे हमने अक्सर ‘दुर्लभ/स्टीरियोटाइप’ के रूप में देखा। आज जब DNT/NT समुदायों की पहचान, अधिकार और स्मृति पर नई बहसें उठ रही हैं, ‘कब तक पुकारूँ’ एक अनिवार्य पाठ है—जो बताता है कि ‘दंगा’ सिर्फ़ ‘हम-वे’ नहीं, ‘हमारे भीतर का वे’ भी रचता है।

 

एक पंक्ति में:


कब तक पुारूँ हिंसा–क़ानून–समुदाय की उलझनों में फँसे एक सीमांत भारत का दर्पण है—जहाँ “पुकार” निजी नहीं, पूरे समाज की ऐतिहासिक माँग बन जाती है।
 


तारीख: 01.09.2025                                    पर्णिका




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