
आत्मविश्लेषी, नारी-केन्द्रीय—आज कम पढ़े जाते, पर अब भी सुई जैसे चुभते सवाल
जैनेन्द्र कुमार का उपन्यास ‘सुनीता’ हिन्दी कथाभूमि में उसी “मोड़” का दस्तावेज़ है जहाँ प्रेम–विवाह, नैतिकता, अहिंसा/हिंसा और स्त्री-एजेंसी के प्रश्न पहली बार इतने नंगे, इतने निजी ढंग से रखे गए। अधिकांश मान्य सूचियाँ इसे 1935 का उपन्यास मानती हैं; शुरुआती दो-तिहाई अंश ‘चित्रपट’ में छपे और एक गुजराती पत्रिका में धारावाहिक अनुवाद भी हुआ। बाद में इसके कई संस्करण निकलते रहे—जिनमें 1941 की एक छपी प्रति का डिजिटाइज़्ड स्कैन भी उपलब्ध है।
जैनेन्द्र प्रेमचन्दोत्तर हिन्दी उपन्यास में मनोविश्लेषणात्मक प्रवृत्ति के प्रवर्तक माने जाते हैं—उनके यहाँ ‘घटना’ से अधिक भीतर की गाँठें महत्त्व पाती हैं। ‘सुनीता’ इस प्रवृत्ति का शुरुआती, साहसी नमूना है, जो आज भी पाठकों/पाठ्यक्रमों में लौट-लौट कर आता है।
कहानी का केंद्र है—सुनीता, एक पढ़ी-लिखी, संवेदनशील युवती; उसके पति श्रीकान्त; और श्रीकान्त का क्रांतिकारी मित्र हरिप्रसन्न। श्रीकान्त घर में हरिप्रसन्न को ठहराता है—एक ऐसा युवा जो ‘उद्देश्य’ के नाम पर हिंसक/आत्मविनाशी उन्माद से भी नहीं हिचकता। श्रीकान्त अपने पत्रों और व्यवहार से सुनीता से अपेक्षा करता है कि वह हरिप्रसन्न की मानसिक गाँठें खोलने में सेतु बने—यहाँ तक कि एक जगह वह लिख भेजता है कि हरिप्रसन्न को “भागने मत देना… उसकी किसी बात पर बिगड़ना मत।” (यहीं से उपन्यास का नैतिक-मनोवैज्ञानिक दायाँ-बायाँ खिंचता है।)
कथा के निर्णायक दृश्य में—जंगल/खुली रात की पृष्ठभूमि—हरिप्रसन्न के आत्मविनाशी रूझान को रोकने के लिए सुनीता अपने को निर्वरण सौंपने तक चली जाती है; पर हरिप्रसन्न पीछे हट खड़ा होता है और अंततः सुनीता उससे हिंसा-त्याग (अहिंसा की प्रतिज्ञा) लेती है। बाद में सुनीता यह सब श्रीकान्त को बता देती है—और श्रीकान्त इसे “किसी व्यक्ति के मानसिक ग्रन्थियों को खोलकर उसका और समाज का भला करना” मान कर कृतज्ञ होता है। (यही प्रसंग ‘सुनीता’ को दशकों तक विवाद/अश्लीलता-वाद के घेरे में ले आया, पर साथ ही इसे हिन्दी में नारी-केन्द्रीय नैतिक बहस का चरम उदाहरण भी बनाया।)
जैनेन्द्र यहाँ प्रेम-त्रिकोण नहीं, बल्कि आत्मा–शरीर–समाज का त्रिकोण रचते हैं—जहाँ स्त्री केवल प्रेरणा या ‘नैतिक दरबान’ नहीं; वह कर्त्री है, जो हिंसा के सामने अहिंसा को व्यवहार में उतारने का जोखिम उठाती है।
• सुनीता: उच्च शिक्षित, विवेकशील; ‘पत्नी’ होते हुए भी स्वयं को नैतिक/मानवीय दायित्व का केन्द्र मानने का साहस। उसके भीतर पतिव्रता बनाम मानवीय करुणा/कर्तव्य का सचमुच कठिन द्वन्द्व चलता है; वह “सती” है या “पतिता”—यह प्रश्न उपन्यास के समय से आज तक बहस में रहा।
• श्रीकान्त: उदार, पर ‘अवलोकक’-सा पति—जो हरिप्रसन्न की ‘रक्षा/उद्धार’ के लिए सुनीता से असामान्य अपेक्षाएँ बाँधता है। उसके पत्र/निर्देश—कभी दयालु शल्य-चिकित्सक, कभी नैतिक जोखिमों से अनभिज्ञ पति—दोनों चेहरों को एक साथ दिखाते हैं।
• हरिप्रसन्न: क्रांतिकारी, अस्थिर मानस, हिंसा-आकर्षण और मृत्यु-कामना से ग्रस्त; शेक्सपीयर/रोमांटिक कवियों/‘ऊँचे आदर्श’ का दीवाना—पर भीतर काम-अभिव्यक्ति और ‘हृदय-अनुनय’ की उलझन। कई समीक्षाएँ उसे जैनेन्द्र के ‘अहिंसा बनाम हिंसा’ विमर्श का वाहक कहती हैं।
अकादमिक व्याख्याएँ बताती हैं कि ‘सुनीता’ में क्रांतिकारी चरित्र और प्रेम-राजनीति का मेल जैनेन्द्र ने मनोविश्लेषण और गांधीवाद—दोनों की रोशनी में रचा; और बाद में यशपाल जैसे लेखकों ने इसी धागे को दादा कामरेड जैसी कृतियों में नयी नैतिक–राजनीतिक धार देकर साधा।
जैनेन्द्र का प्रिय औज़ार है—भीतर की बातचीत: कम घटना, ज्यादा आत्म-संवाद; कम थियेटर, ज्यादा नैतिक/मनोवैज्ञानिक उद्घाटन। ‘सुनीता’ में यह मनोवैज्ञानिक रेखांकन जगह-जगह आलोचकीय विवाद का कारण बना—किसी ने इसे “सहज, स्वाभाविक” कहा; किसी ने “पहेलियों का आग्रह”। पर लगभग सभी ने माना कि जैनेन्द्र के यहाँ नारी-अनुभव और आत्म-अवलोकन कथा का केंद्र हैं।
दिलचस्प है कि कुछ अध्येताओं ने विशेषतः ‘सुनीता’ में कथानक की ड्राइव को पात्र-विकास पर थोड़ी प्राथमिकता दी मानकर उसे “जैनेन्द्र के मनोविज्ञान-केंद्र से थोड़ा अलग” कहा—यानी यहाँ क्लाइमेक्स/एक्शन का दबाव ज़्यादा महसूस होता है। यह मतभेद भी इसी उपन्यास की बहस-योग्यता का प्रमाण है।

• अहिंसा बनाम हिंसा—नीति नहीं, व्यवहार
हरिप्रसन्न के ‘उन्माद’ के सामने सुनीता अहिंसा को क्रिया बना देती है—वह उपदेश नहीं पढ़ती; जोखिम उठाती है। नारी-देह यहाँ न पूजा-वस्तु है, न निषिद्ध फल—वह कर्तव्य/करुणा का कठिन माध्यम बनकर उभरती है। प्रसंग की इसी तीक्ष्णता ने ‘सुनीता’ को “नयी नैतिकता” की बहस का केन्द्रीय पाठ बनाया।
• देह बनाम आत्मा—‘सती’ की परिभाषा किसकी?
आलोचकों में बहस चली—यदि ‘सती’ का अर्थ ‘हृदय-पत्नी’ है, तो सुनीता सती; यदि ‘शरीर-पत्नी’ ही कसौटी है, तो? जैनेन्द्र इस ठस परिभाषा से इन्कार करते हैं; वे विवाह को संवाद का नैतिक अनुबंध मानते हुए ‘धिक्कार/वर्जना बनाम करुणा/उद्धार’ का द्वन्द्व खोलते हैं।
• विवाह, मित्रता और स्त्री-एजेंसी
श्रीकान्त के “नैतिक प्रयोगों” के बीच भी निर्णय-केन्द्र सुनीता ही है—वह न पीड़िता में सिमटती है, न प्रलोभन में; वह संकट का सक्रिय निवारण है, जो अंततः कहने/छिपाने की बजाय बताने/संवाद को चुनती है। यही उसे जैनेन्द्र की नायिकाओं—मृणाल (त्यागपत्र), कल्याणी आदि—की पंक्ति में नैतिक-सुबोध नायिका बनाता है।
‘सुनीता’ अपने समय में विवादास्पद रही—जंगल वाला “निर्वरण” दृश्य वर्षों तक अश्लीलता-वाद का लक्ष्य बना; पर समकालीन/उत्तरकालीन पढ़ाइयाँ इसे यौन-नैतिकता के यथा-स्थिर खाँचों को तोड़ती, गांधी-मनोविश्लेषण के पुल बनाती रचना कहती हैं। कई विश्वविद्यालय-पाठ्यक्रमों में अब भी इसका वर्ष 1935 दर्ज है—यानी यह किताब “नई नैतिकता” के इतिहास में संस्थापक पाठ की हैसियत रखती है।
उपन्यास के क्रांतिकारी पात्र और नैतिक-आत्मविश्लेषण की युक्ति ने बाद की हिन्दी में गहरी तरंगें पैदा कीं—हद यह कि यशपाल ने अपने दादा कामरेड (1941) में ‘सुनीता’-प्ररूप की नायिका/स्थितियों को वर्ग-राजनीति/लेबर-टर्न के साथ नया अरथ दिया। यह अप्रत्यक्ष संवाद/विवाद हिन्दी राजनीतिक-उपन्यास की रीढ़ में पढ़ा जा सकता है।
जैनेन्द्र कुमार (1905–1988)—हिन्दी में मनोविश्लेषणात्मक कथा के अग्रणी; पद्म भूषण (1971), साहित्य अकादेमी पुरस्कार (1966, मुक्तिबोध), और अकादेमी फेलोशिप (1979) से सम्मानित। ‘परख’ (1929), ‘त्यागपत्र’ (1937), ‘कल्याणी’ (1939), ‘सुखदा’ आदि के साथ ‘सुनीता’ उनकी प्रमुख आरम्भिक नायिका-केंद्रित कृतियों में है।
संस्करण/उपलब्धता: पुराने संस्करण मिलना कठिन हैं; पर ‘सुनीता’ के नये पेपरबैक्स उपलब्ध हैं और डिजिटल पढ़ने/डाउनलोड के लिए ‘हिन्दवी’/‘आर्काइव’ जैसे स्रोतों पर सुलभ है।
• आरम्भिक प्रकाशन: अधिकांश सूची/शोध 1935 बताते हैं; 1941 का संस्करण स्कैन रूप में मिलता है—यानी पाठ-परम्परा लगातार चलती रही।
• पूर्वप्रकाशन: दो-तिहाई अंश ‘चित्रपट’ में; गुजराती पत्रिका में धारावाहिक अनुवाद—यानी ‘नैतिक-विवाद’ की चर्चा बहुभाषी पाठक समुदाय में भी पहुँची।
• अध्ययन-उद्धरण: कई शोध-लेखों/नोट्स में श्रीकान्त-सुनीता-हरिप्रसन्न त्रिकोण के दृश्य उद्धृत—विशेषकर वह प्रसंग जहाँ सुनीता “तुम मुझे चाहते हो तो ले लो” कहकर हरिप्रसन्न से अहिंसा की प्रतिज्ञा लेती है।
• आरम्भ—घर का क्लौस्ट्रोफ़ोबिया, श्रीकान्त का “नैतिक प्रयोग”, और हरिप्रसन्न की अशांत/रोमांटिक ऊर्जा—यहीं से ‘आत्मा-शरीर’ का टकराव शुरू होता है।
• मध्यांश—श्रीकान्त के पत्र, हरिप्रसन्न-सुनीता के संवाद; भाषा में करुणा/दंड/उद्धार के बदलते अर्थ। पढ़ते-पढ़ते महसूस होगा कि जैनेन्द्र का मक़सद ‘किसी की जीत’ नहीं, ‘एक गाँठ खोलना’ है।
• निर्णायक दृश्य—‘जंगल/रात’ वाला प्रसंग; उसके तुरंत बाद स्वीकार-संवाद: सुनीता सब बताती है, श्रीकान्त सुनता है। यहीं उपन्यास सामाजिक निर्णय पाठक पर छोड़ देता है।
• सहपाठ—जैनेन्द्र की ‘त्यागपत्र’ और यशपाल की ‘दादा कामरेड’ साथ पढ़ें—देखेंगे कि ‘स्त्री-एजेंसी/क्रांति/अहिंसा’ की रेखाएँ हिन्दी में किस तरह आपस में बहस करती चली आई हैं।
‘सुनीता’ का सौन्दर्य/साहस इस बात में है कि वह विवाह को मालिकाना हक़ नहीं, संवाद का अनुबंध मानती है—और स्त्री को ‘त्याग-मूर्ति’ नहीं, नैतिक निर्णय लेने वाली मनुष्य। सुनीता के निर्णय हमें असहज कर सकते हैं—पर वही असहजता हमें यह देखने को मजबूर करती है कि हिंसा केवल बम/छुरा नहीं; वह अहं, अनसुना करना, और दूसरे की पीड़ा को वस्तु बना देना भी है। श्रीकान्त का “मोरल एक्सपेरिमेंट”, हरिप्रसन्न का ‘उद्देश्यवादी उन्माद’, और सुनीता का जोखिम-भरा करुण-विवेक—तीनों मिलकर बताते हैं कि नैतिकता कोई दीवार नहीं; वह चलती हुई बातचीत है।
और शायद इसी लिए जैनेन्द्र आज कम पढ़े जाने के बावजूद जरूरी लगते हैं—क्योंकि वे हमें ‘आसान उत्तर’ नहीं, कठिन प्रश्न देते हैं: पत्नी किसकी? देह की, हृदय की, या अपने विवेक की? क्रांति किससे? दूसरों के रक्त से, या अपनी हिंसक प्रवृत्ति के त्याग से? ‘सुनीता’ इन प्रश्नों को किसी नारे में नहीं घोलती; वह उन्हें जीवन-दृश्य बनाकर हमारे सामने रख देती है—ताकि हम अपने समय के भीतर भी उनकी गूंज सुनें।
सुनीता पढ़ना जैसे अपने ही भीतर की बहस से दो-चार होना—जहाँ प्रेम, करुणा, शरीर और सिद्धान्त एक-दूसरे की परीक्षा लेते हैं—और पाठक, न्यायाधीश नहीं, सहभागी बनता है।