न जाने किनका ख्याल आ गया 

न जाने किनका ख्याल आ गया 
रूखे-रौशन पे जमाल* आ गया 

जो झटक दिया इन जुल्फों को 
ज़माने भर का सवाल आ गया 

मैं मदहोश न हो जाती क्यों-कर 
खुशबू बिखेरता रूमाल आ गया 

मैं मिट जाऊँगी अपने दिलबर पे  
बदन तोड़ता जालिम साल आ गया  

मेरे हर अंग पे है नाम उसकी का 
यूँ ही नहीं हुश्न में कमाल आ गया 


तारीख: 27.07.2019                                                        सलिल सरोज






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है