मंजिलें कुछ ही दूर हैं 


 
जिंदगी का अनजाना सफर 
रास्ता कहे कि चल
बस मंजिलें कुछ ही दूर हैं ।।
देख इस विराने में भी 
मैं तेरे साथ हूँ ।
जो बुना है तूने उसी
स्वप्न का यथार्थ हूँ ।
थक नहीं चलता ही चल 
देख सामने कि
बस मंजिलें कुछ ही दूर हैं ।।
यह वृक्ष संग पवन के

अजनबी डर से डराते होंगे 
न हो व्यथित 
यह डर ही तेरा 
पहरेदार है ।
तू  क्यों व्याकुल कि
बस मंजिलें कुछ ही दूर हैं ।।
हरियाली से अटी 
यह पगडंडी 
सूखे पत्ते बिछाए 
वर्षों से तेरे स्वागत 
में सजी हैं ।
धर पग,धीरे मगर 
मजबूती से ।
सुन स्वर चलने का 
कि तू ही सुन पाएगा ।
जो धुन सजाई है प्रकृति ने ।
मधुर संगीत यह 
तू ही गुनगुनाएगा
 संघर्ष की स्वर लहरी 
यही कहे कि 
बस मंजिलें कुछ ही दूर हैं ।। 
 


तारीख: 17.03.2018                                                        मुक्ता शर्मा






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