मूर्तिकार की कल्पना


मैं मूर्तिकार की कल्पना सी थी, जब - जब उसकी कल्पना में जो विचार आता गया, वो मेरी रचना करता गया।  दिया साकार रूप मुझे करता था मीठी - मीठी बातें मुझसे दिन-रात बैठा रहता था मेरे पास निहारते मुझे, देखा करता था घंटो मुझे और सोचता था यह मेरी ही कल्पना है ! जिसे मैंने ही रचा है , ईश्वर का शुक्रिया अदा करता था  बार - बार बिताता था हर पल मेरे साथ, करता था सुख - दुःख की बातें मेरे साथ, मैं भी अपने पर इतराने लगी, संचार होने लगा भावनाओ का लगता था धीरे - धीरे पत्थर की मूरत से हाड़ - मांस का पुतला बनते जा रही हूँ।  पर अचानक कुछ समय बाद कम होने लगा उसका मुझसे बात करना, वो मुझसे आलिंगन करना, सुख - दुःख बांटना, धीरे - धीरे होने लगी मैं फिर बेजान पत्थर की मूरत सी। 


               उसकी चाहत ने भुला दिया था, मैं तो उसकी कल्पना मात्र हूँ ! जब तक उसके  मस्तिष्क में रहूंगी तब तक, उसके बाद मेरा कोई वजूद नहीं, मैं तो मूर्तिकार की कल्पना थी।  मिटा दिया उसने वो सब जो सपने संजोए थे मेरे साथ, थामकर मेरे हाथो को, जिन पत्थर के हाथों में भी उसके स्पर्श से चेतना जाग्रत होने लगी थी. छोड़ दिया उसने वो सब कुछ हो गई, मैं फिर बेजान सी मूरत जैसी.


                 और एक दिन वही हुआ जिसका मुझे हमेशा से भय था, मिटा दिया अपने मस्तिष्क से मुझे, मेरी हर बात को, मेरी हर याद को, जो दिया था - साकार रूप पत्थर को इंसान के रूप में, तोड़ दिया वो मोह का हर बंधन, कर दिया मेरे हर रूप को खंड - खंड।  बन गई मैं फिर पत्थर की मूरत सी, इतना ही काफी नहीं था - जैसे ही उसकी कल्पना से बाहर आई तो मिटा दिया उसने उस मूरत को भी, जो कभी दिल के करीब थी उसके। मैं भूल गई थी,  मैं तो उसकी कल्पना थी ? जब चाहे वो बनाये , जब चाहे तोड़ दे, चाहे तो बात करें, मनुहार करे, प्रेम अलाप करे और जब चाहे तोड़ दे सारे बंधन को। 


                मैं तो मूर्तिकार की कल्पना मात्र, तेरे मस्तिष्क में उपजी कल्पना ही तो थी - मैं ? जब तक मस्तिष्क में विचारो का आना - जाना बस तब तक मेरा वजूद जैसे ही विचार गायब, मेरा वजूद भी ख़त्म ? यदि उतारता तू मुझे अपने दिमाग से दिल के किसी कोने में, जगह देता अपने दिल में, तो मेरा रूप कभी न मिटता , रहती सालों - साल तेरे साथ मूरत बन तेरे घर का हिस्सा बन, किसी कोने में खड़ी निहारती रहती, अपने रचनाकार को ? पर मैं तो तेरी कल्पना मात्र थी ? मैं तो मूर्तिकार की कल्पना थी, मैं तो तेरी कल्पना ही थी ?????


तारीख: 22.08.2019                                                        मंजू सोनी






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है