ऎ सहर

बड़ी बेचैनी सी फैली है तेरे  फिज़ा में ,
सन्नाटों में अजब  सी सुगबुगाहट है 
सब चल रहे हैं  मगर  ऎ सहर 
राह  में न जाने  कैसी रूकावट है |

बड़ा ग़मगीन मिजाज है ऎ तेरा सहर ,
सूरमाओं को धूल चटा  गीदड़ो को सेहरा पहना रखा है । 
जिनके हाथ देश की कमान होनी चाहिए थी 
मजबूर कर उनको दहशत का मददगार बना रखा है ॥ 

कलम के मुख पे कालिख पोत ,
सजावटो से सितम  ढाह  रहे तेरे सहरी  ॥ 
सीमाओ के बटावरो का, बंदरबाट कर ,
हाथ में धर्मधव्ज लिए,  सीमा लाँघ रहे तेरे सहरी ॥ 

सदियों पुरानी मुद्दो के जज़्बात पे ,
पार पायी थी हमने रह के यूं साथ में ॥ 
चाबुक चलाते है बिना किसी छाप के 
मरने मारने पे उतारू है  सहर बिना किसी बात के ॥ 


इतनी बेइंतिहा बर्बरता देख तू मूक कैसे है । 
बेबसी से कराहती छंद सुन, तू चुप कैसे है ॥ 
जवाब न देना ,जवाबदेही  का नया अंदाज है । 
जुल्म को सहना ही इस सहर का मिजाज है ॥ 


तारीख: 29.06.2017                                                        पंकज कुमार






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