जीवन क्या हैं समझ रहा हूँ

जीवन क्या हैं समझ रहा हूँ
जितना समझा उलझ रहा हूँ। 


ऊँचे पर्वत गहरी खाई 
यामिनी रातें और तन्हाई


सब कुछ देखा सब कुछ समझा
जीवन फिर भी समझ ना आया


सब कुछ पाया इस जीवन में
अंत समय जब आया इसका
कुछ ना पाया कैसी माया


पढ़ी किताबें सब कुछ देखा
किस्मत थी या हाथों की रेखा


कोई इसको कुछ समझाता
कोई कुछ ही समझ रहा है


सबकी अपनी-अपनी दुनिया
सबका अपना अलग नजरिया


निश्चय नहीं हैं समझ हमारी
अनिश्चय भी कह नहीं सकते


समझ हमारी कितनी छोटी
धर्म-ज्ञान सब समझ लिया पर
क्यों समझा ये पता नहीं हैं 


सागर समझे सरिता समझी
सच मगर हम समझ न सके


जो समझा वो मतलब का था
या मतलब से सब समझा हमनें


समझ हमारी कितनी कम हैं
खुद को पर हम समझ न सके
दुनिया को क्या समझा हमने


जीवन क्या है समझ रहा हूँ
जितना समझा उलझ रहा हूँ। 


तारीख: 22.09.2017                                                        प्रेम एस. गुर्जर






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