माँ हूँ भगवान नहीं

यह बात हमेशा मैंने अपनी माँ से सुनी " माँ बनना प्रकृति का वह आशीर्वाद है जो ऊपर वाला बहुत खुश होकर ही एक नारी को प्रदान करता है “और मैं इस बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ। मेरा तर्क माँ बनने पर कतह ही नहीं है, मैं तो इस देश में माँ को बेवजह भगवान बनाकर उसके निजी व्यक्तित्व को छीन लेने पर अपनी बेचैनी व्यकत करना चाहती हूँ। 

उदाहरण के तौर पर गर्भ धारण करने से लेकर आगे आने वाले उसके पूरे जीवन मे उसे केवल त्याग करने वाली उस व्यक्ति की तरह देखा जाता है जो सिर्फ देना जानती है, माँगना उसका अधिकार नहीं है ।

Maa hu bhagwaan nahi

एक नारी माँ बनकर सिर्फ खुद को नहीं बल्कि पूरे परिवार को सम्पूर्ण करती है,पर उसकी माँ बनने की यात्रा हमेशा सुखद नहीं होती,वह चुप रहती है और कई बार अपने आप से समझौता करती है। उसके आस-पास बसा पूरा समाज अपना सारा काम छोड़ उसे अच्छी माँ बनने की नसीहत देता है ,आने वाले बच्चे की फ़िक्र सबको सता रही होती है पर उसका क्या जो जननी बनेगी ,सब उसको भूल जाते है और आने वाले मेहमान की तैयारी में जुट जाते है। 

अब किसी को फ़र्क नहीं पड़ता की बादाम का छिलका उसके गले मे फंसता है, उसे खाना होगा क्यूंकि वह आने वाले बच्चे की सेहत की लिए लाभकारी है। 

अब उसका खाना, उसका रहना सब वैसा होना चाहिए जो उसके आने वाले बच्चे पर असर डाले, रामायण पाठ में भले ही उसकी रुचि ज्यादा ना हो पर अब उसको फ़िल्मी गानो की जगह उसे देनी पड़ेगी क्यूंकि यह उसके गर्भ में पल रहे अंकुर को अच्छे संस्कार देंगे ताकि बड़ा होकर वह शबरी के बेर बने ना की ए.आर रेहमान या किसी और फ़िल्मी संगीतकार का संगीत। “सुनने में अजीब लग रहा होगा पर यह सच्चाई है हमारे समाज की”। 

चलिए थोड़ा आगे बढ़ते है और स्वागत करते है उस दिन का जिसका सब इंतज़ार कर रहे थे ,और सबसे जायदा वह औरत जो पिछले नौ महीने से अपने कोख मे अपने जीवन की सारे अरमान छुपाये बैठी थी और एक लम्बी और सफल यात्रा की बाद मिलने वाले आराम के इंतज़ार मे हर पल काट रही थी, क्यूंकि आज वह इस दुनियाँ की सबसे महत्वपूर्ण पद को हासिल कर लेगी, बस और कुछ देर की असहनीय पीड़ा के बाद……….. वह माँ बन जाएगी। 

उस पल हॉस्पिटल में दवाई से ज्यादा बधाई बाँट रही थी, मुबारक हो आप पापा बन गए, मुबारक हो आप दादा बन गए, हर एक सदस्य घर का बधाई बटोरने में लगा हुआ था,क्यूंकि कोई मामा ,कोई बुआ ,कोई नाना, कोई नानी जो बन गया था। पर किसी ने भी माँ बनाने की बधाई नहीं दी शायद सूरज का निकलना ही सुबह होने का प्रमाण होता है इसलिए कोई सूरज को गुडमोर्निंग नहीं बोलता, क्यूंकि सबको लगता है की कहने की क्या जरुरत यह तो जग जाहिर बात है ,इसलिए किसी ने नहीं कहा........" मुबारक हो आप माँ बन गयी "

शिशु पालन का सफर शुरू होता है। अभी मुन्ना खेल रहा है इसलिए यही सही समय है माँ के लिए घर की सारे काम निपटाने का क्यूंकि घर की सभी लोग उसके साथ-साथ अपना भी मनोरंजन कर रहे है। किसी को वो अपने पिता की परछाई दिख रहा है तो किसी को अपने दादा का पुर्नजन्म । पर हैरानी की बात है जिसका आंश है उसके जैसा किसी को नहीं लग रहा है मुन्ना। 

अब जब सब खेल खत्म हो गए और बच्चे ने रोना शुरू कर दिया तब हर किसी की नज़र माँ को ढूढ़ती है,क्यूंकि शायद उसको भूख लगी है,कई बार ऐसा एहसास हर माँ को होता है की वह माँ से ज्यादा एक दुधारू गाय की भूमिका निभा रही है. अब वह मदर से “मदर डेयरी” बन गयी है, उसका बच्चा सिर्फ अपनी भूख मिटाने की लिए ही उस पर आश्रित है। 

अब क्यूंकि वह मात्र एक स्त्री नहीं बल्कि एक माँ भी बन गयी है तो यह सिर्फ उसका कर्त्तव्य बनता है की वह दफ्तर से जल्दी निकले, अगर वो ५ बजे की बाद भी काम करती है तो उसके मातृत्व पर सवाल उठेंगे , इसकी भी संभावनाएं है की वो खुद को भी दोषी समझे क्यूंकि जिस समाज में हम जी रहे है, यह उसी के बनाये नियम है जिसे हम सब बिना सोचे समझे ही अपना चुके है। 

अब क्यूंकि वो एक माँ है तो उसका जीवन तो बदलना चाहिए, इसलिए सिर्फ उसका बदलता है बाकि हर कोई अभी भी अपने मर्जी की जिंदगी जी रहा है। स्कूल, डॉक्टर,खेल,और बाकि सभी जिम्मेदारियां उसी को निभानी है ,जिसके लिए कोई आभार व्यक्त नहीं किया जायेगा बल्कि जरा से भी चूक हुई तो निसंदेह एक असफल माँ की श्रणी में जरूर खड़ा कर दिया जायेगा ।

कई बार ऐसी स्तिथि भी बन जाती है जब वो अपने बच्चो के भविष्य के लिए खुद के भविष्य को त्याग देती है या यह कह लीजिए की उसे घर के किसी कोने में रख कर भूल जाती है। डॉक्टर या इंजीनियरिंग की डिग्री के लिए उसने भी कई रातें काली की थी ,पर उसका अब कोई मोल नहीं वह सिर्फ कागज के पीले टुकड़ो से ज्यादा कुछ नहीं है। टीवी पर उड़ान देखते समय कितनी बार उसने खुद से वादा किया होगा की अगली किरण बेदी वो ही बनेगी। आज जब सब पा चुकी है तो उसको सब त्यागना पड़ेगा क्यूंकि वो माँ है और उसका धर्म है की वो अपने बच्चो के लिए खुद से पहले सोचे,समाज में ऐसी सोच रखने वाली माताओ की मैं इज़्ज़त करती हूँ ,अगर एक माँ नहीं सोचेगी अपने बच्चो के भविष्य की बारे में तो और कौन सोचेगा,मेरा सवाल सिर्फ इतना है की सिर्फ माँ ही क्यों सोचे। …कोइ और क्यों नहीं सोच सकता ,गर्भ भले माँ ने धारण किया पर उस प्रकिया में पिता का भी पूरा योगदान था,जब नाम पिता का है थो भविष्य की जिम्मेदारी सिर्फ माँ की क्यों ? 

हम सब ने माँ की त्याग पर अनगिनत कहानियाँ और लेख पढ़े और सुने होगे,पर कोई भी इस संसार के इतनी सुन्दर कृति की उपलब्धियों की बारे में नहीं लिखता। त्याग पर इसलिए क्यूंकि त्याग ही चाहते है सब माँ से ,उपलब्धि कहाँ चाहते है ? त्याग सर्टिफिकेट है जिसके बिना माँ नहीं बन सकता है। 

हम में से कई लोग बल्कि यह कहना भी गलत ना होगा की ज्यादातर लोग माँ की तुलना भगवान से करते है ,उसे मंदिर में बिठा देते है ,अब जैसे की हम भगवान की पास अपनी जरुरत की मुताबिक जाते है वैसे ही हम माँ की पास भी अपने मतलब से जाते है। माँ भूख लगी है,दोस्त की साथ फिल्म जाना है पापा से सिफारिश कर दो वग़ैरह -२ 
पता नहीं कब एक जीता जागता इंसान त्याग की मूर्ति भगवान बन जाता है ,क्यूंकि अब वो भगवान बन गया है तो उसे गलती करने का अधिकार नहीं है ,वह सिर्फ सबके दुःख सुन सकती है, उनको कम करने की लिए खुद को और पीड़ा दे सकती है पर उसका दुःख कौन सुनेगा। 

कब चाहा था किसी भी माँ ने भगवान बनना वो सिर्फ अपने बच्चो की माँ बनकर ही तृप्त थी। पर इतने सारे कर्तव्य और त्याग ने उसे ना जाने कब भगवान बना दिया ,आज वह एक मजबूर भगवान है जो सिर्फ अपने कर्तव्य पालन की लिए जी सकती है अपने खुद के स्वपन पूर्ती के लिए नहीं।

मेरा यह लेख बहुत ही साधारण सा सवाल रखना चाहता है हमारे संवेदनशील सामाज के सामने की: 
क्यों पहचानते हो 
नारी को सिर्फ
उसके त्याग और बलिदान से 
तुम जैसी इंसान है 

ना बनाओ भगवान 
जीने दो उसको भी आराम से 
हर कर्तव्य वो निभाएगी 
अपने पूरे अहसास से 

मत बाँधो उसको पिंजरे में 
उड़ने दो खुले आकाश में


तारीख: 08.05.2015                                                        मनीषा श्री






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