इश्क में शहर होना - किताब समीक्षा

Ishq me shehar hona book review

 

रवीश कुमार की पत्रकारिता के कायल बहुतेरे लोगों में से एक मैं भी हूँ, वो जिस सादगी से अपने प्रोग्राम पर मुद्दे की बात कर जाते हैं, वो लहजा उनको बाकी पत्रकारों से अलग करता है. फेसबुक पर जब मैंने सुना की रवीश कुमार ने एक किताब लिखी है तो इधर-उधर खोजता हुआ मैं लप्रेक के फेसबुक पेज पर पहुंचा और वहां से मुझे मालूम हुआ की रवीश जी ने "इश्क में शहर होना" नाम की एक लघु प्रेम कथा लिखी है जो ऑनलाइन आर्डर कर के मंगाई जा सकती है, बस क्या था मैंने तुरंत किताब आर्डर की और बेसब्री से किताब का इंतज़ार करने लगा. 

किताब के मुझ तक पहुँचने तक मैं किताब के नाम पर जब-तब सोचता रहा की ये कैसा नाम हुआ, इश्क में शहर होना, सच कहूं तो ये नाम मुझे थोड़ा अटपटा लग रहा था और ये बात मेरी उत्सुकता को थोडा बढ़ा रही थी. 3 दिन के इंतज़ार के बाद किताब ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दी और मैं लालायित बच्चे के जैसे किताब के पन्ने पलटने लगा. मेरे एक नज़र के जायजे से ये पता चला की किताब की कहानियाँ बहुत ही छोटी थी , 200-250 शब्दों की एक कहानी, मेरी कुछ समझ नहीं आया की इतने कम शब्दों में क्या कहानी लिखी जा सकती है, कहीं कुछ अलग करने के चक्कर में रवीश जी ने कोई गड़बड़ तो नहीं कर दी. 

फिर मैंने सोचा की अब अपनी अटकलों को थोड़ा आराम देते हुए मुझे किताब शुरू करनी चाहिए सो मैंने वैसा ही किया. किताब की प्रस्तावना में रवीश जी ने बिहार के एक छोटे गाँव से अपने शहर दिल्ली की गलियों तक के सफ़र के बारे में बताया है, इन पन्नो में साफ़ झलकता है की उनकी जड़ें गाँव से कितनी मजबूती से जुड़ी हैं की वो अपने शहर में आज भी अपने गाँव को तलाशते हैं . दरअसल ये किताब एक डायरी जैसी है जिसमे रवीश ने शायद अपने और अपने आस-पास के लोगों के जीवन की घटनाओं को एक-एक पन्ने में उकेरा है. यह किताब एक लघु प्रेम कथा है, कथा कहने की कला में ये एक नया प्रयोग है जिसमे कहानियाँ अत्यधिक छोटी मगर उतनी ही प्रभावपूर्ण और मार्मिक हैं. इस किताब में कुछ ५०-१०० कहानियां हैं जो वैसे तो 2-3 घंटे में ख़त्म की जा सकती हैं पर ये कहानियाँ आपको धीरे-धीरे शहर के कई आयामों से धीरे धीरे गुजरने को कहेंगी . 

रवीश की कहानियों में प्रेमी जोड़े हैं जो शहर के अलग-अलग कोनो में अपने प्यार को तलाशते हैं, जो अपने महबूब में शहर को देखते हैं. किताब उन प्रेमी जोड़ो की मनः स्थिति दर्शाती है जो शहर के भीड़-भाड़ में अपने प्यार को जीने की जगह तलाशते हैं, मेट्रो के सफ़र के दौरान, ऑटो में बैठे शहर घूमते समय, किसी भीड़-भाड़ वाले बाज़ार में या कॉलेज के गेट के बाहर के रस्ते पर ये जोड़े अपने अपने तरीके से अपने प्यार को मुक्कमल करते नज़र आते हैं. रवीश की ये लाइन इन प्रेम कथाओं पर एकदम सटीक बैठती है "जब आप प्यार में होते हैं तो शहर को ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकते हैं और हर छोटे और अंजान कोनों का सम्मान करने लगते हैं". इन कहानियों में शहर भी उतना ही जिंदादिल है जितना की कहानियों में प्रेम, दोनों को एक दूसरे से जुदा करना मुश्किल है, शहर एक बड़े वृक्ष की तरह अपनी हर शाख पर हज़ारों ऐसे प्रेमी पंछियों को बसेरा दे रहा है जो उसकी शाख पर प्रेम गीत गा रहे हैं. कहानियाँ शहर में होते बदलाव से इन प्रेमियों के जीवन पर होते असर के कई पहलुओं को दिखाती है. 

पूरी किताब ख़त्म करने पर मुझे ऐसा लगा की मैं रवीश के शहर में हूँ और उसकी हर गलियों से, हर चौराहे पर होने वाली चहल-पहल, जीवन चक्र से वाकिफ़ हूँ. भले ही मैं दिल्ली में कभी नहीं रहा पर इस शहर और इसमें पनपने वाली प्रेम कहानियों के मिज़ाज को काफी करीब से महसूस कर रहा हूँ. ऐसा कमाल एक दक्ष लेखक की लेखनी से ही हो सकता है और रवीश जी से मुझे यही उम्मीद थी. प्यारी कहानियों के साथ-साथ विक्रम नायक के चित्रांकन ने हर कहानी को जीवंत कर दिया है. मेरी तरफ से इस किताब को पूर्ण अंक मिलते हैं और मैं इस समीक्षा को पढने वाले पाठको को इस किताब को पढने की जरूर सलाह दूंगा.


तारीख: 08.06.2017                                                        यायावर






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