बचपन की दोस्ती और प्यार के बीच के संघर्ष की दास्तान है-विद यू विदाउट यू

क्या प्यार कई तरह का होता है? क्या बचपन का प्यार बस एक आकर्षण मात्र होता है या फिर वो जवानी में भी उतना ही मायने रखता है? क्या आज के समय में सच्चे प्यार की प्रासंगिकता समाप्त हो चुकि है? क्या प्यार बस पाने का नाम है? ऐसे ही कई सवालों के जवाब तलाशती किताब है-विद यू विदाउट यूI जिसके लेखक हैं-श्री प्रभात रंजन और इसे स्टोरी मिरर ने प्रकाशित किया हैI कीमत मात्र 250 रुपये हैI

With you without you book review

इसकी कहानी मुख्यत: चार किरदारों निशिन्द, आदित्य, रमी और रश्मि के इर्द गिर्द घूमती हैI बीच बीच में कुछ जगहों पर कई और किरदार आते और जाते रहते हैंI यह कहानी निशिन्द की कहानी है जो अपने ही पड़ोस में रहने वाली लड़की रमी से तब से प्यार करता है जब वो चार साल का थाI हालांकि यह बात अजीब लग सकती है कि इतनी छोटी उम्र में प्यार के बारे में क्या मालूम होता हैI पर यह प्यार है, जो कभी भी उम्र का मोहताज नहीं रहा हैI

बचपन में निशिन्द की जिन्दगी बस दो लोगों के आसपास घूमती है एक तो रमी जिससे वो बेहद प्यार करता है और दूसरा उसका दोस्त आदित्यI पर कक्षा दस में आते-आते उसे यह एहसास होने लगता है कि जिस रमी को वो दिलो-जान से चाहता है वो उसके दोस्त आदित्य को पसंद करती हैI यह बात उससे बर्दास्त नहीं होती और एक दिन वो कुछ ऐसा कर बैठता है जिसके फलस्वरूप रमी उसकी जिंदगी से हमेशा-हमेशा के लिए दूर चली जाती हैI बाद में उसे अपनी गलती का एहसास तो होता है पर वो उसे सुधार नहीं पाताI इसका प्रायश्चित वो अगले बारह सालों तक करने की कोशिश करता रहता हैI

समय निकलता रहता है और आदित्य रमी को भूल कर अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाता है पर निशिन्द कभी भी रमी को भुला नहीं पाताI निशिन्द हमेशा रमी को अपने पास ही महसूस करता हैI फिर उनके जीवन में एक और लड़की आती है रश्मिI जिसकी बहुत सी आदतें रमी से मिलती हैंI निशिन्द को ऐसा लगता है कि वो रमी ही है पर आदित्य इस बात को साफ तौर पर खारिज कर देता हैI लेखक अंत तक इस रहस्य को बनाए रखने में कामयाब रहता है कि आखिर यह रश्मि है कौन और इसका रमी के क्या रिश्ता हैI

कहानी को इतनी अच्छी तरह से कहा गया है कि आप अंत तक उससे जुड़े रहते हैंI मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस किताब को पढ़ते समय आपकी आँखें खुद खुद भींग जाऐंगीI निशिन्द का रमी के लिए प्यार और अपने दोस्त आदित्य के लिए समर्पण आपको भावुक कर देगाI बीच में कई जगह कुछ सस्पेंस भी है जो पाठक को बाँधे रखने में कामयाब रहता हैI इसको पढ़ते समय कई बार आप इसके अंत को समझने की कोशिश करेंगे और आपको लगेगा कि इसका अंत ऐसा ही होगा पर फिर अगले कुछ पन्नों में आप अपनी राय बदलने पर मजबूर हो जाऐंगेI

लेखक ने स्थानों के विवरण पर बहुत अधिक ध्यान दिया है चाहे वो उसका लखनऊ का घर हो या फिर चोरी से सलमान की फिल्में देखने जाने वाले थियटरI गोवा के बारे में तो इतना विस्तार से बताया है कि आपको ऐसा लगेगा कि आधा गोवा तो आपने घूम ही लिया और बचे हुए आधे को देखने के लिए आप अभी निकल पड़ेंगेI

कहीं-कहीं कुछ लाईनें आपको बहुत ही अच्छी लगेंगी जैसे-

"कई बार इन्सान की अपनी दुनिया और वास्तविक दुनिया के बीच के फासले काफी ज्यादा होते हैं और जिसे हम अपनी नंगी आँखों से देख भी नहीं पाते, पर जब कोई हमें इस फासले का अहसास कराता है तो हम खुद की बेवकूफी के बदले उसे ही दोषी मान लेते हैं जो हमें सत्य का आइना दिखा रहा होता है।"

"कोई भी इन्सान अपने आने वाले जीवन का एक भी दिन कम करने के लिए शायद ही सहजता से तैयार हो पर यदि उसे अपने बीती जिन्दगी से कुछ दिनों को मिटाने का विकल्प मिले तो वह अपने बीते जीवन के जाने कितने सारे दिनों का नामोनिशान मिटा दे।"

"हर शहर की अपनी एक खुशबु और गंध होती है, अब यह आप पर निर्भर है कि आपको कौन सी खुशबु सूकुन देती है।"

"आपकी कोई भी बड़ी से बड़ी जीत तब तक अधूरी है जब तक उसमें आपके तमाम अपनों की हिस्सेदारी हो।"

"बीते कल में ही जीने से इन्सान आज और आने वाले कल को खो देगा।"

ऐसी और भी बहुत सी लाईनें हैं जो जिंदगी के बारे में लेखक की सोच की गहराई से आपको रूबरू कराती हैंI

अब अगर किताब के नकारात्मक पहलुओं की बात करें तो कहने के लिए ज्यादा कुछ नहीं मिलता हैI हाँ अगर रश्मि की जिंदगी के बारे में लेखक ने थोड़ा और विस्तार से बताया होता तो अच्छा होताI कहीं-कहीं कुछ घटनाऐं अधिक ही काल्पनिक लगती हैं या फिर अचानक से कुछ खराब या सही हो जाता हैI रश्मि और रमी की तुलना बहुत अधिक की गई सी लगती हैI पर अंत तक जाते-जाते आप उस पर ध्यान नहीं देंगेI

पूरी तरह से हैप्पी एंडींग तो नहीं है इसकी पर इसका अंत आपको चौका भी देगा और आप यह भी कहने को मजबूर होंगे कि मुझे लग रहा था ऐसा होगा पर यकीन नहीं थाI कुल मिला कर यह एक बेहतरीन किताब है जो पढ़ी जानी चाहिएI

 

 


तारीख: 03.12.2017                                                        आलोक कुमार






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