मरीज-ए-इश्क़ को अब कोई दवा न लगे

मरीज-ए-इश्क़ को अब कोई दवा न लगे। 
तुम्हारे बिन कोई सुबह, मुझे सुबह न लगे। 

तेरे इश्क़ में इस कदर दीवाना है ये दिल,
तेरी दी हुई कोई सजा, इसे सजा न लगे। 

बहुत तड़प चुका हूँ आतिश-ए-हिज्र में, 
अब इस आग को और हवा न लगे। 

यूँ तो अक्सर कह देता हूँ उसे मैं बुरा-भला।
खुदा इतना करना, उसे मेरी कोई बद्दुआ न लगे।


तारीख: 17.06.2017                                                        अर्पित गुप्ता 






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