मर्ज़ी मौला की

भई हम भी, सफर करते जो ये रस्ते ना वीरां होते,
कुछ, करने की ख्वाइश होती, दिल में अरमान होते,     

कोई साथ अगर देता, हम भी, सफर में,निकल पड़ते,
अपना तो साथ ही था, हमसफ़र का भी सामान ढोते,

साथ जो चल देता, साथी यूँ साथ निभाते तेरे ही संग,
ऐ काश कि, अपने भी साथ, कोई इक, मेहरबान होते,

वैसे तकदीर ही साथ होती तो क्यों हम यूँ तनहा रहते,
जहाँ कदम पड़े अपने वंही, क्यों ये सब, बियाबान होते,

भटका ही रहा तू राज इस सफर में अपने, ज़िंदगी भर,
यूँ कदमो तले, ये ज़मीन होती तेरे सर पे आसमां होते,

पर तू दिल पे न लेना बात, सब मौला तै करता है,बन्दे,
जब हसनें को कहता हंस देते और जब रोना तो रो देते,

भई हम भी, सफर करते, जो ये, रस्ते, ना, वीरान होते,
कुछ, करने की ख्वाइश होती, इस दिल में अरमान होते !! 


तारीख: 17.06.2017                                                        राज भंडारी






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