कहाँ ढूंढूँ तुम्हें

कहाँ ढूंढूँ तुम्हें ?
विकल हो नज़रें,
घूमती हैं चहूं ओर
उपर नीचे ।

नहीं लगा पातीं थाह,
नहीं खोज पातीं ,
अस्तित्व तुम्हारा ।

क्यों ? आखिर क्यों ?
छोड़ गईं निर्वात सा
मेरे जीवन में ?
चली गईं सहसा
पैदा करके शून्यता का बोध ।

कैसे छंटेगा घटाटोप अंधेरा
बिना तुम्हारे ?
कैसे होंगे पूरे वो अरमाँ
जिसकी जड़ों में थी
नितान्त आवश्यकता
तुम्हारे आशीष रूपी जल की ।

हाँ । तुम भी तो थीं
मेरे उन अरमानों में सहज,
अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ ।

मेरी हर सोच,स्वप्न ,
और उड़ान की आधारशीला
तुम ही तो थीं ।

उस सोच और उड़ान की
जो ले जाती थी मुझे
क्षितिज के समीप,
और समीप ।

मेरे अरमानों का मुख्य बिन्दू
भी तो था यही
कि क्षितिज पर भी
मेरे सर पर
बना रहे तुम्हारा हाथ,
यथावत, शुभाशीष के साथ ।

तुम ही तो थीं,वो प्रेरणा,
वो शक्ति
जिसके बल पर
लाना चाहता था मैं मुस्कान
उन तमाम चेहरों पर
जो मुरझाए हैं, सदियों से
अभिशप्त हैं ढोने को नैराश्य भाव ।

पर न जाने क्यों
चली गईं तुम
छोड़ कर मुझे अकेले ही
जूझने को खुद से,
एक वृहद खालीपन के साथ
पर टूटूंगा नहीं मैं,
बनाउँगा प्रेरणा इसी खालीपन को ।

करूँगा प्रयास
कि भर सकूं सुन्दर सपने
उन आँखों में
जो दूःस्वप्नों को ही
मानती रही हैं
अपनी नियति ।
बस जगा रहे ज़मीर,
जागी रहे चेतना,
यही है आकांक्षा
मेरी दादी माँ ।।


तारीख: 11.06.2017                                                        राकेश “कमल”






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