नदी

युगों-युगों से 
अंबर-अंबर
पर्वत-पर्वत
जंगल-जंगल
अनहद नाद की तरह बजते हुए
अपने-आप में मग्न हो
बस उसे बहते रहना था
क्योंकि बहना :
नदी होना है


तारीख: 09.08.2019                                                        आमिर विद्यार्थी






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है