चेहरा इक तेरा महताब लगता है

चेहरा इक तेरा महताब लगता है 
कोई महका हुआ शबाब लगता है ।
 
हाँथ में हाँथ जिसमे हो तेरा मेरा
खूबसूरत वो ख्वाब लगता है ।
 
देखता तुझको हूँ जो जुल्फ खोले
शहर का मौसम खराब लगता है ।
 
चाहे जो कहो उसके बारे में
यार  मेरा लाजबाब लगता है ।
 
देखता हूँ जो उसके पीछे कारवां
शहर भर का इंतखाब लगता है ।
 
सम्हल कर चलना रेत में यारो
जहाँ देखो वहाँ आब लगता है ।
 
सोचता हूँ कह दूँ दिल की बातें 
डर उससे पर बेहिसाब लगता है ।
 
पूछा जो इश्क़ है मुझसे कितना
आँखों में उनके इताब लगता है ।
 
नही सहता है कोई अब जुर्म यहाँ
दिलों में आ गया इंकलाब लगता है ।
 
नही सहता है कोई अब जुर्म यहाँ
दिलों में आ गया इंकलाब लगता है ।


तारीख: 15.06.2017                                                        ऋषभ शर्मा रिशु






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है