पूरब और पश्चिम

पूरब में सूर्य का आगमन हो चुका था,
पश्चिम से खर्राटों की आवाज आ रही थी,
वो अपनी नींद के झोकों में हिलकोरे ले रहे थे।
आया सूर्य यहाँ भी,किन्तु उस रूप में नहीं
जैसा पूरब में दिखा था,
क्योंकि वहाँ इसे देवत्व प्राप्त हो चुका था ।


एक पहल हो चुकी थी मस्तिष्क के क्रोड में,
महसूस हो चुका था ,पहले-पहल की यह बला क्या है?
चूँकि पूरब के लोग देख चुके थे पश्चिम से पहले,
प्रकृति का नग्न-रूप नग्न आँखों से ।


संदेह न था इसमें की प्रारंभिक चीजे ढूंढ लिया होगा,
रोजमर्रा से सम्बंधित,
और शरू हुई होगी चिंतन की प्रक्रिया 
प्रकृति के तमाम रहस्यों को समझने की ।


यह तो सर्वविदित है,
प्राकृतिक सम्पदा से संपन्न था पूरब
पर पश्चिम के सामने तमाम समस्या,
उन्होंने यात्राएं प्रारम्भ की भौगोलिक। 


यहाँ पूरब में सब-कुछ सुलभ था,
निकल पड़े ये लोग आंतरिक यात्रा पर,
दिया पुरे धरा को एक-से-बढ़कर एक 
रहस्मयी-विस्मयकारी सूचनाएं,
मनुष्यता की रक्षा हेतु ।


बनाया एक सनातनी परंपरा 
जिसे हिन्दू -विज्ञान का नाम दिया ।
पश्चिम की यात्राएं जारी थी,
बढ़ चले थे पूरब की तरफ,
अबतक पता चल चुका था,
कि भारतवर्ष(आर्यावर्त)ही वह स्थान है,
जहाँ ऋषि-मुनियों ने किये थे कई आविष्कार,
वे जितने चिंतनशील थे उतने ही दयालु,
किया ग्रहण शिष्यत्व मुनियों का 
और पाया ज्ञान
ब्रह्मांड का,कि जिसमे कई रहस्य समाहित थे ।


फिर यहाँ से शुरू हुआ पूरब-पश्चिम का खेल,
जो आज भी जारी है .........बस उसका रूप बदल गया है ।


तारीख: 20.10.2017                                                        धीरेन्द्र नाथ चौबे"सूर्य"






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