मेरे अरमां

 

तेरे हृदय में प्रीत मेरा जग उठे
इस आस में अरमां मेरे जीते रहे।

थक गई जब प्रार्थना मेरी प्रिये,
बुझ गए जब साधना के भी दीये,
जब हृदय ने भी नहीं धीरज दिया,
व्यंग्य मेरी चेतना ने भी किया,
अश्रु को मरहम बनाने के लिए,
नैनों से अश्रु नित्य ही झरते  रहे ।

तेरे हृदय में प्रीत मेरा जग उठे
इस आस में अरमां मेरे जीते रहे।

उर में छिपाए आंधीयों को था पवन,
बारिशों के रूप ले रोता गगन,
मन में विरह का दर्द ले रोती दिशा,
भोर से मिलने को आतुर थी निशा,
सब यहां थे प्रीत पाने के लिए,
पर हम हृदय के ज़ख्म को सिते रहे ।

तेरे हृदय में प्रीत मेरा जग उठे
इस आस में अरमां मेरे जीते रहे।

हर इक पतंगा प्रीत पाने के लिए,
अपनी शमां का लौ जलाने के लिए,
मिट रहा अपने प्रिये की चाह में
तन जला मन में समाने के लिए,
इस अगन में कब से हम हैं जल रहे,
जिंदगी के रंजो गम सहते रहे ।

तेरे हृदय में प्रीत मेरा जग उठे
इस आस में अरमां मेरे जीते रहे।

बीतता था क्षण मेरा युग की तरह,
सिसकियां चलती थी सांसों की तरह,
पर मन में बाकी अब भी मेरी आस थी,
प्रीत पाने की जो उर में प्यास थी,
इस आस में ही हम विरह पीते रहे ।

तेरे हृदय में प्रीत मेरा जग उठे,
इस आस में अरमां मेरे जीते रहे।

नीलकंठी सत्य बनकर है रहा,
जिंदगी ने धूप छांव दोनों सहा,
सत्य यही शाश्वत रहा है विश्व में,
प्रेम ने अमृत पिया विष भी पिया,
गरल, सुधा दोनों ही पीने के लिए
तुमसे मिलन के दीप को उर में लिए,
प्रीत की ये प्यास उर जगते रहे ।

तेरे हृदय में प्रीत मेरा जग उठे
इस आस में अरमां मेरे जीते रहे।

हर कली भ्रमरों के खातिर थी खिली,
कृष्ण के विरह में राधा थीं जली,
मृत्यु से श्रृंगार तन ने कर लिया,
स्व मरण का भार खुद मन पर लिया,
प्रेम को अमरत्व देने के लिए
मन ,हृदय मुझको सदा छलते रहे ।

तेरे हृदय में प्रीत मेरा जग उठे
इस आस में अरमां मेरे जीते रहे।


तारीख: 23.08.2019                                                        प्रकाश कुमार






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