दूल्हे की सेल

भारतीय बाज़ारों में जो सबसे लोकप्रिय, दीर्घकालिक, पूर्णतया एकतरफा जो खरीद है , वह है दूल्हा । इस खरीद की तैयारी बेटी के जन्म के साथ शुरू हो जाती है।

आप खरीद के लिए अपने पास पूँजी जमा करते हैं । पता नहीं कल क्या भाव हो ! यह पूँजी दो तरह की होती है : एक, आपकी बेटी के संस्कार, रंग रूप, उसकी पढ़ाई, उसका चरित्र, यानी आपकी बेटी । 

vyang lekh

दूसरी तरह की पूँजी होती है वह कागज़ जो भारतीय सरकार द्वारा खरीद फ़रोख्त के लिए अधिकृत है यानि रूपया । बेचारा दुल्हन का पिता न जाने कहाँ कहाँ से बचाकर रुपया जोड़ता जाता है । कितनी ही बार भ्रष्टाचार निरोधक दस्ते से बचता हुआ निकल पता है, कितनी ही बार अपने फटे कपड़ो पर थेगडे लगता है पर नए नहीं बनवाता ।मात्र दुल्हन का पिता है नहीं उसकी माँ भी बेचारी होती है । आप उससे पूछिए कि अंतिम बार साड़ी कब लायी थी, याद नहीं होगी इतनी पुरानी बात । अब ज़रा पूछिए की बेटी के लिए कितना रुपया किस कम में लगाने की सोची है सारे भाव तोल पता होंगे, दस साल पहले क्या था सोने का भाव और अब क्या है, अजीब तीक्ष्ण बुद्धि है ! 

तो ये दो तरह की पूंजी होती है जो दुल्हन के माता पिता जीवन भर एकत्रित करते रहते हैं । यह सोचकर कि काम आयगी , दुल्हन को ऐसा दूल्हा मिलेगा कि बिरादरी वालो की आँखें फटी रह जाएँगी । क्या कमी है हमारी पूजी में, न बेटी में, न रूपये में । मंदिर वाले पंडित जी बोल रहे थे कि लड़की को लाखों में एक वर मिलेगा , चिंता कि क्या बात ! 

अब ज़रा लड़के वालों का हाल भी सुनिए । बात बढाने के लिए नहीं, इसलिए ताकि बाद में यह न हो कि एक ही पक्ष की बात सुनी। लड़के का पिता उसके जन्म के साथ ही एक प्रकार के आत्मीय घमंड से लबरेज़ हो जाता है । क्यों? क्योंकि वह उसकी पूंजी बढ़ाएगा । पूँजी कैसे बढ़ेगी ? उसको बेचकर । एक अच्छा व्यापारी अपने माल की बहुत हिफाज़त करता है । उसे सहेज कर रखता है, उसके रख रखाव में कोई कमी नहीं आने देता । अरे भाई , जब माल दिखाया जायगा तो लगना तो चाहिए कि लाखो में एक है ! यह लड़के का व्यापारी अर्थात उसका पिता उसे अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाता है। महंगे से महंगे स्कूल में पढ़ता है । सब वसूल हो जायगा बिकवाली के समय । 

लड़का यह सब जनता है । फिर भी कभी विरोधी स्वर नहीं उठा पता । ठीक ही है भाई ! माता पिता का अपमान करना कौन से शास्त्र की नीति है ? लड़के की माता की अपनी अलग दुनिया है । वह अपने बेटे की उपलब्धियों से गर्वित है, और संपूर्ण समाज में यही प्रदर्शन करती रहती है कि देखना जी, जब मेरे बेटे की शादी होगी , तब देखना, ऐसी दुल्हन आयेगी जो गहनों से लदी होगी , अपने साथ मेरे लिए भी गहने लाएगी । घर की रौनक बढ़ाएगी । जब घर का एक एक चम्मच नया खरीदा हुआ होगा लड़की के पिता की पूँजी का तो रौनक नहीं बढ़ेगी क्या ! 

इस सारी खरीद फ़रोख्त में लड़की की चर्चा करना भूल गये हम । लड़की संसार में आते ही देखती है कि यह संसार लड़कियों के लिए नहीं है । उसे तो यहाँ कोई छोड़ गया है । अब जबरन संसार में भेज दिए गये इस प्राणी के लिए संसार का रवैया क्या होगा, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लड़की के रोने पर उसे चुप कराने की बजाये उल्टा थप्पड़ जड़ दिया जाता है । 

खैर, लड़की सारी स्थिति समझती है इसलिए स्वयं को मज़बूत करने की ठान लेती है । सरकारी स्कूल में पढ़ती है और वहीँ पर अच्छे से अच्छा ज्ञान प्राप्त भी कर लेती है । हमेशा अव्वल रहती है इस कोशिश में कि शायद अगली उपलब्धि पर उसकी माता खुश हो जाये । पर ऐसा नहीं होता । माता तो खुश तब होती है जब लड़की पहली बार गोल रोटी बनती है । अजीब अंतर है उपलब्धियों का ! बहरहाल , हम व्यापार की बात कर रहे थे । 

हाँ तो, खरीदने के लिए पूँजी तैयार है और बेचने के लिए माल तैयार है । अब आती है बाज़ार में कूच करने की बारी । व्यापारी यानि लड़के का पिता अपने पुत्र को नुमाइश के लिए रखता है । 

" देखिये साहब क्या माल है । इतना पढ़ा लिखा, इतना सुन्दर । खूब खर्चा किया है इसके रख रखाव पर, अब मुनाफे की दरकार है । खरीदना है तो बोलो ।"

ग्राहक यानि लड़की का पिता, "हाँ साहब, क्या भाव दिया दूल्हा? देखिये पूँजी की कोई कमी नहीं , माल बढ़िया होना चाहिए । कोई कमी निकली तो और भी दुकाने हैं ।"

"अरे नहीं जी, इससे बढ़िया माल कहाँ मिलेगा आपको? चाहे तो परख लीजिये । लाखों में एक है ।" लड़के के पिता की छाती चौड़ी हो जाती है ।

"लाखों में एक ! यही तो चाहिए था बस । लाखों में एक ही ढून्ढ रहा था । क्या भाव दिया ?"

"अजी भाव क्या, बस आपका ही हुआ । दाम के लिए नहीं बेचा रहा हूँ । बस अब तकल्लुफ मत कीजीये , माल ले जाइये । दाम की चिंता मत कीजिये ।"

"अरे नहीं , फिर भी कुछ तो मोल लेंगे अपने कीमती माल का । बताइए क्या लेंगे ? पूँजी कि कमी नहीं है , कहिये ?"

"अजी कैसी बात कर दी, पैसे का क्या मोल आपके मेरे रिश्ते के आगे । आपकी पूँजी भी तो अनमोल है । जो दे देंगे, ले लेंगे ।"

"अच्छा तो फिर १२ मोहरे ठीक रहेंगी, कहिये ? लाने ले जाने का खर्चा भी मेरा, १२ मोहरें लीजिये और माल दीजिये, ले जाऊं?"

"जी? १२ मोहरें ? अजी थोडा तो बढाइये साहब, माल तो देखिये, क्या सिर्फ १२ मोहरों में बेच दूंगा इसे ? बहुत कीमती , लाखों में एक है ।"

"लेकिन मैं भी तो बड़ी मेहनत से अपनी पूँजी इकट्ठी की है, उसकी कोई कीमत नहीं है क्या? "

"अरे आपकी पूँजी मेरे माल के लिए ही तो है, क्या मुफ्त में ले जायेंगे ? लाखों में एक है ।"

"तो आप बताइए फिर कितनी में बेचेंगे?"

"कम से कम २० मोहरें । इससे कम नहीं ।"

"२० मोहरें !!! बहुत ज्यादा हैं ये तो । मैं नहीं खरीद सकता ।"

"तो जाइये, फिर कोई और खरीद लेगा । हमारा माल ऐसे ही बेच देंगे ?"

"लेकिन मैंने तो अपना माल १० मोहरों में बेचा है । आपसे अच्छा माल था ।"

"तो क्यों बेच दिया ? क्यों नहीं वसूली अपनी लागत ? हमारी गलती नहीं इसमें ।"

"अच्छा जी देखते हैं , २० मोहरें तो ज्यादा हैं । आता हूँ और जगह देख कर ।"

मोलभाव करने के बाद सारे बाज़ार में ग्राहक घूमता है पर ऐसा माल कहीं नहीं मिला । वाकई लाखों में एक है । व्यापारी को भी दूसरा कोई ग्राहक नहीं मिलता है । कहाँ मिलेगा ऐसा ग्राहक जिसने खून पसीना लगा दिया हो पूँजी में, कहाँ मिलेगी ऐसी पूँजी ? दोनों देखते हैं एक दूसरे की ओर ।

"क्या साहब, क्या कहते हैं, १२ मोहरों से बढाइये थोडा और ।"

"क्या १५ मोहरें बहुत रहेंगी आपके माल के लिए ?"

"१५ !!! जी ये तो कम हैं । हमारा माल लाखों में एक है ।"

"तो फिर मैं और लाख माल देख लूँगा, रहने दीजिये । कहीं तो दूसरा माल मिलेगा मेरी पूँजी के लायक ।"

"अरे अरे ! आप तो नाराज़ हो गए । ठीक है १५ सही । माल आपका हुआ । पर लेन ले जाने का खर्चा आपका होगा । १५ मोहरें तो मेरे पास रहेंगी ।"

"हाँ हाँ ठीक है । तो बात पक्की रही १५ मोहरों पर । माल हमारा हुआ । यह लीजिये पूँजी । संभाल कर रखियेगा, जीवन भर की मेहनत है पूँजी में ।"

"अजी चिंता न करें, आपकी पूँजी सुरक्षित है ।"

व्यापारी का माल बिक गया । ग्राहक की पूँजी चली गई । लाखों में एक माल मिला है !


तारीख: 10.06.2017                                                        पूजा गोयल 






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