नारी 'शून्य' और मैं

दो अजनबी इंसान , एक दूसरे से अनिभिज्ञ जब विवाह के बंधन मे बँधते हैं, तब बहुत सारी अनजानी, अनकही आदतों को आत्मसात कर लेते हैं ! सुखी जीवन के लिए दो अजनबियों मे किसी एक को अपने स्वाभिमान की आहुति देनी होती है !
बहुत कम सम्बन्धो मे ऐसा होता है , जब दोनों  अजनबी इंसानो की सभी आदते एक दूसरे से मेल खाती हो ! अकसर तालमेल बिठाने के लिए औरतो को ही अपनी काफी इच्छाओ का दमन करना पड़ता है !


सुखी जीवन के लिए वो नटखट, अलहड़ सी लड़की जो सदा अपनी माँ के साये मे जीवन बिताती है, कब एक औरत और फिर माँ बन जाती है पता ही नहीं चलता ! माँ से जीद करती, अपनी हर बात बाबा से मनवाती लाडली कब चुपचाप सर झुकाये सबकी बात सुनने वाली आदरणीय बहु बन जाती है पता ही नहीं चलता !


इन सबके बीच एक अनचाही, अनकही सोच स्त्री के मस्तिस्क मे आकर लेने लगती है ! इच्छाओ का दमन करना, सबकी बात मानना, चुपचाप अपने आसुओं को बहाना उसकी फितरत बन जाती है ! माँ और बाबा से सब कुछ बाँटनेवाली लड़की उनसे सबकुछ छुपाना सिख जाती है ! जीवन साथी अगर अच्छा मिले तो इन सब तकलीफो के बावजूद खुशी-खुशी जीवन नैया पर हो जाती है , परन्तु यदि वह सही न हो बीच भवर मे सबसे विदा लेने  मे भी वो नहीं हिचखिचाती ! आज बाहर चलना है , नहीं चलना चलना है ? खाना बाहर खाना है , नहीं खाना है ? सुबह जल्दी उठ जाया करो ! अभी तक तैयार नहीं हुई ? खाना सही से बनाया करो ! कितनी बरबादी ? ये सब बातें बहुत ही मामूली प्रतीत होती है, परन्तु एक स्त्री, एक पत्नी, एक गृहणी, एक माँ, एक बहन रोज इन सब सवालो के बीच तिलमिल जलती है ! प्रतिदिन जाने अनजाने पति, भाई, पिता दवारा न जाने कितनी बार उनका स्वाभिमान छलनी किया जाता है !


शुरुआत घर से, बचपन से होती है, और उसकी प्रतिकाष्टा ससुराल मे पहुंचकर होती है ! जिंदगी कुछ इस तरह मोड़ लेती है कि उससे भागना मुश्किल हो जाता है और फिर कब वह आत्मसमर्पण कर उसी को अपना भाग्य मान जीवन व्यतीत कर देती है !
 जब उसके जीवन मे मातृत्व की दस्तक होती है, तब वह पूर्णतया समर्पित  बन जाती है ! फिर उस नन्ही सी जान के जीवन के लिए वह सबकुछ भुला कर बस लड़ती रहती है ! इन सबके बीच वह शून्य बन जाती है ! गणित मे शून्य का कुछ मूल्य है परन्तु नारी एक ऐसा शून्य बन जाती है जिसमे बस अंधकार ही अंधकार नजर आता है !


सोचो तो अंधकार, पर ममत्व की अठखेलियों मे सवयं को वो इतना डुबो देती है कि वही शून्य कब प्रकाशमय बन जाता है पता ही नहीं चलता ! बच्चे कि साथ वह अपना बचपन ढूंढ लेती है ! उसकी हँसी मे हँसने और उसके गम मे रोने लगती है ! उसकी जिंदगी अब दूसरे मोड़ पर मुड़ जाती है , जहाँ वह रात -दिन बस भागती नजर आती है ! फिर उसकी सारी जिंदगी बस इस चार दिवारी मे सिमट जाती है ! यह सोच अपनी - अपनी है ! कोई इसमें अदभुत आनंद पा लेता है, वही कोई इसमे से बाहर निकलने के उपाय ढूंढते - ढूंढते  बस यहाँ - वहाँ गोते लगता नजर आता है ! इस ममत्व का आनंद या गोते लगाते लगाते कब जिंदगी अंतिम पड़ाव की ओर मुड़ जाती है पता ही नहीं चलता ! इस पड़ाव मे फिर नारी अकेली पड़ जाती है ! फिर उसका स्वाभिमान कुचला जाता है ! इस बार और कोई नहीं, जिसकी ममता मे उसने अपना जीवन झोंक दिया था, उसी संतान दवारा !


किसी कोने मे निढाल पड़ी, छत को अँधेरे मे ताकती अपने अंतिम पड़ाव कि इंतज़ार मे ...


यदि हम इस नारी की तुलना आज की नारी से करे, तो कहीं न कहीं वह थोड़ी मजबूत नजर आती है ! आज वह किसी पर मोहताज नहीं है ! उसने अपनी राह चुन ली है , पर फिर भी इन सबके बीच कहीं न कहीं वह जकड़न वह शून्यता छुपी हुई है , जो किसी भी वक्त दबे पाँव चुपचाप मुँह दिखाती है और फिर वही शून्य को ताकती नारी अंतिम पड़ाव का इंतज़ार करती नजर आती है....


तारीख: 16.07.2017                                                        दीपा कैलाश






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