जब कभी झूठ की बस्ती में, सच को तड़पते देखा है

जब कभी झूठ की बस्ती में, सच को तड़पते देखा है
तब मैंने अपने भीतर किसी, बच्चे को सिसकते देखा है

माना तू सबसे आगे है, मगर न बैठ यहाँ अभी जाना है
मैंने दो चार कदम पर मँज़िल से, लोगों को भटकते देखा है

धन, दौलत, रिश्ते, शोहरत, मेरी जान भी कोई चीज नहीं
मैंने इश्क़ की ख़ातिर ख़ुल्द से भी, आदम को निकलते देखा है

ये हुस्न ओ आब तो ठीक है लेकिन, गुरुर क्यूँ तुमको इस पर है
मैंने सूरज को हर शाम इसी, आसमाँ में ढ़लते देखा है

अपने घर की चारदिवारी में, अब लिहाफ में भी सिहरन होती है
जिस दिन से किसी को ग़ुर्बत में, सड़कों पर ठिठुरते देखा है

पहले छोटी छोटी खुशियों को, सब मिल कर साथ मनाते थे
अब छोटे छोटे आँगन में, रिश्तों को सिमटते देखा है

तुम आज भी मेरे अपने हो, शायद इन्सान हो और ज़माने के
वरना मौसमों से पहले हमने, अपनों को बदलते देखा है

किस बात पे तू इतराता है, यहाँ वक़्त से बड़ा तो कुछ भी नहीं
कभी तारों से जगमग आसमाँ में, सितारों को टूटते देखा है


तारीख: 30.07.2017                                                        प्रमोद राजपुत






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