हलचल

हलचल हलचल
हलचल हूँ मैं ! 
 
हूँ आज अभी,
फिर कल हूँ मैं
आँखों के तम के बीच पडा
तारों का झुंड अटल हूँ मैं ! 
 
हलचल, हलचल....... 
 
सूरज सा द्रश्य हूँ दुनिया को
पर खुद में ही ओझल हूँ मैं
इंसानों में दिख रहा विफल
पागलों के मध्य सफल हूँ मैं !
 
हलचल, हलचल.......
  
कभी शांत सरोवर में निशांत
कभी नदिया की कल-कल हूँ मैं
तितली सा रंगारंग, कभी
मुर्दा निश्तेज अचल हूँ मैं ! 
 
हलचल, हलचल....... 
 
दुविधा के काँटों से शोभित,
पुष्पों का सुंदर दल हूँ मैं,
कीचड में, मैला हूँ, पर सुन
पंकज हूँ मैं, निर्मल हूँ मैं ! 
 
हलचल, हलचल.......
 
जीवन हलचल, हलचल जीवन
अस्थिरता, अश्रुजल हूँ मैं
स्थिरता के क्षण मिल जाए
हलचल उतनी, इक पल हूँ मैं
  
हलचल, हलचल......
  
अभिलाषा दुर्गम ज्योति की
देखो, कैसा चंचल हूँ मैं
चिंगारी लगने का विलंब
प्रश्नो का क्या, तब हल हूँ मैं ! 
 
हलचल, हलचल......                  


तारीख: 10.06.2017                                                        पुष्पेंद्र पाठक






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है