ये बात है कुछ साल पुरानी

ये बात है कुछ साल पुरानी
सुनी थी मैंने अपने दादी की ज़ुबानी 
रूह काँप जाती है आज भी
सुन के ये अद्भुत और अविश्वसनीय कहानी


प्रतापगढ़ के पुरानी बस्ती में 
एक जीतेन्द्र बाबू रहते थे 
घर पे जुड़वाँ बच्चे थे
और दोनों बारहवीं में पढ़ते थे 

परीक्षाओं क संपन्न होते ही 
भोला दिल्ली जाना चाहता था
मुन्नी की तो शादी भी तय हो गई थी
उसे तो घर पर ही रहना था

कई साल बीत गए
भोला का घर पे कोई खत नई आया था
मुन्नी की शादी में भी
भोला सम्मलित न हो पाया था

भोला क नए दोस्त ही अब उसका परिवार थे
शराब और तम्बाकू ही अब उसके जीवन का सार थे
उसकी मजबूरियां तो कोई नई समझता है
शहर वालों को गांव जाने का वक़्त कहाँ मिलता है

उधर गांव में जीतेन्द्र बाबू को दिल का दौरा आया था
अस्पताल का प्रसिद्ध चिकित्सक भी कुछ नई कर पाया था
शेष कुछ लम्हों में भी उन्होंने अपने पुत्र को ही याद किया था
कहते हैं मृत्यु से पहले आखरी बार उन्होंने भोला का ही नाम लिया था

ठीक तेरह दिन बाद
घर पे तेरहवीं का कार्यक्रम था
लोक लज्जा और शर्म के मारे
एक रात पहले भोला दिल्ली से प्रतापगढ़ की ओर चला था

महीना माघ का था
जाड़ा भी जमकर पड़ा था
दिल्ली में कोहरे क कारन 
रेलगाड़ी कुछ विलम्ब से ही चला था


खो गए थे कहीं कुछ रिश्ते
एक माँ से उनका बीटा और एक बेहेन से उसका भाई
तीन घंटे विलम्ब से चल रही गाडी 
पहुँच चुकी थी प्रतापगढ़, समय हो रहा था ढाई 

स्टेशन में कुछ तो अलग बात थी
शीट ऋतू में मुश्लाधार बरसात थी
बहुत ज़ोर से हिल रही थी पेड़ों की पत्तियां
नहीं जल रही थी स्टेशन की एक भी बत्तियां

स्टेशन क ठीक बाहर
एक रिक्शा वाला खड़ा था
चेहरे में उसने शॉल जड़ा था
जाड़ा भी तो बहुत पड़ा था

भोला के पता बताने से पहले
रिक्शा ने पुरानी बस्ती क पांच रूपए मांगे
रिक्शा वाले की आवाज़ में कुछ तो बात थी
जीतेन्द्र बाबू की आज तेरहवीं की रात थी

बड़े ही आश्चर्य की बात थी
रिक्शा वाले की आँखों में नमी थी
और रिक्शा की गति बहोत ही धीमी थी
जैसे थोड़ा और समय व्यतीत करना हो
जैसे किसी अपने से आखरी बार मिलना हो

घर पहुँचते ही, काम वाले काका ने दरवाज़ा खोला
भोला को सामने देखकर बड़े ही उदास शब्दों में बोला
आज अगर जीतेन्द्र बाबू ज़िंदा होते
तो वे स्वयं ही अपने पुत्र को लेने स्टेशन जाते

हो सकता है ये सब कुछ एक संयोग हो
वो आवाज़, वो कद-काठी सिर्फ मन का एक रोग हो
पर ये कहानी थी एक पवित्र रिश्ते की, एक बाप की
ये कहानी थी बच्चों क दायित्व की, एक पश्चाताप की 


तारीख: 20.03.2018                                                        शुभाजित रॉय






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है