जंग (ज़िन्दगी की ज़िन्दगी से)

जीना चाहोगे अगर तो तुम जी लोगे ,
ज़िन्दगी से गम का ज़हर तुम पी लोगे, 
ख़ुशी  ही मिलती है हर मोड़ पर यह सच नही बन्दे ,
हाँ! तुम कभी गम के पहाड़ों को भी झेलोगे।

पर मन ना कभी हार इन गम के समन्दर से,
जगाना अपनी हिम्मत को खुद के ही अन्दर से ,
थोडा वक़्त लेकर ही सही पर आएगी ख़ुशी ,
दिल से लेकर चेहरे तक छा जाएगी हँसी।

गम का क्या???
अरे हारेगा गम गिरेगा तुम्हारी कदमों में,
तुम माफ़ कर देना उसे यूँ ही मतवाले लफ्जों में ,
शर्म खाकर, शर्म में ही ,शर्म से टूट जायेगा ,
खुद ही चला जायेगा कमबख्त, फिर ना लौटकर आयेगा।
                      फिर ना लौटकर आयेगा।


तारीख: 19.06.2017                                                        प्रशान्त कुमार चतुर्वेदी






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है