तुम बिन माँ

तुम बिन माँ दिन ऐसे बीते जैसे बड़ी बीमारी है।
तुम बिन मन है सूना -सूना जीवन जीना भारी है।
सच कहता हूँ ममता तेरी याद बड़ी अब आती है।
तुम बिन माँ जीवन है ऐसा जैसे कोई बीमारी है।

देखो तेरा बेटा रोता छुप-छुप पीर छुपाता है।
मन मे घुटता कुछ न कहता निशिदिन नीर बहाता है।
चली गयी हो तुम जब से माँ इस घर के आँगन से,
है आँगन अब सूना सूना जैसे छाई खुमारी है।

ऐसा मन है जैसे रचना बिगड़ गयी हो कागज़ पर,
जीवन सपना टूट गया है चिड़ियों की आवाजो पर,
अब तो ऐसे मैं जीता हूँ इस अनजाने पथ पर माँ,
राह दिखाजा ओ माँ मेरी पथ पर चलना भारी है।

सारे रिश्ते छूटा दिए है स्वारथ के अरमानो ने,
सब कुछ मेरा लूट लिया है दुनिया के भगवानों ने।
अब कैसे मैं दर्द दिखाऊँ इन मिट्टी के पुतलों को,
बिन माँ का बेटा हूँ सो यह सबसे बड़ी लचारी है।

देखो तेरा "राघव " बैठा ये कैसे दोराहे पर,
इधर अंधेरा उधर अंधेरा सब हँसते है अब मुझ पर,
अजब खेल है ऊपर बाले तू भी खूब ग़ज़ब का है,
माँ छीन के यह कहता है किस्मत मे ये तुम्हारी है।

कोई घर हो न बिन माँ के कोई माँ हो न बिन घर की,
मेरी मानो दुनियावालो इज़्ज़त करना तुम माँ की,
मेरे किस्मत जैसी किस्मत न हो मेरे दुश्मन की
माँ बिन जीवन ऐसे होता जैसे कोई बेगारी है।

इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ ग़ज़ब की है,
एक तो मेरी माँ की सूरत
एक उसकी फनकारी है।।


तारीख: 30.06.2017                                                        कुमार राघव श्रीवास्तव






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