आ माला

आ माला !!
परिष्कृत प्रेम में निज स्वार्थ को त्यागें ,
यातनाएँ झेलकर गृह शांति ही मांगें ,
तू लक्ष्मी की सफ़ीर है लक्ष्मी तू नही प्रियसी ,
युक्ति कुछ कर दस्यु का कुछ कर्म ही जागे !!

हाँ माला !!
दुर्बल बनी तू आज तो वेदना पाए ,
दरिद्र रावण को क्यों तू पालती आए ,
चन्द सिक्कों की भूख़ में पापी बने स्वामी 
और दया की ओट में तू आँसू भी पी जाए ....

हाँ माला !!!
निरर्थक अर्थहीन आधार क्यों लगता ,
क्यों काली का रूप ना हो अब क्यों अब तक तू माँ सीता,
चलो अब जाग कर दुर्गा बनो प्यारी ,
ममता की चादर उतारो आज लगा दो तुम चिंगारी ....

परिष्कृत -शुद्ध , सफ़ीर - दासी , दस्यु -डाँकू , युक्ति - क्रिया / चाल 


तारीख: 29.06.2017                                                        शशांक तिवारी






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