हे पथिक

हे पथिक!
हे पथिक! तू चल
तेरी नियति है चलते जाना
चाहे कुछ भी हो
तू रुक ना जाना

ये धरती सूरज चाँद सितारे
सब गतिमान हैं
चलना ही जीवन
स्थिरता मुर्दों की पहचान है
है तेरी मंज़िल
जिसे तुझे है पाना
हे पथिक! तू चल
तेरी नियति है चलते जाना

राह में हो सहर सुहावनी
या हो तम दुशवार
मोह का अतिरेक हो
या भावनाओं का ज्वार
ये सब किसी यायावर का फसाना है
हे पथिक! तू चल
तेरी नियति चलते जाना है

मार्ग में कंकड़ पत्थर चट्टानें भी होंगी
तुझे रोकना है ये ठाने भी होंगी
तू चलायमान जल है
अपना रास्ता तुझे बनाना है
जहाँ से जहान देखे
वो मुक़ाम तुझे पाना है
हे पथिक! तू चल
तेरी नियति चलते जाना है

राह में भटकाव व्यकुलताएँ भी होंगी
मगर साथ तेरे हक़ में माँगी दुआएं भी होंगी
उन छोटी आँखों के बड़े सपनो को
अपने प्रारब्ध तक है पहुँचाना
हे पथिक! तू चल
तेरी नियति है चलते जाना
चाहे कुछ भी हो तू रुक ना जाना
हे पथिक! तू चल
तेरी नियति है चलते जाना


तारीख: 30.06.2017                                                        राहुल तिवारी






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है