दोहे रमेश के होली पर

दिखे नहीं वो चाव अब, .....रहा नहीं उत्साह ! 
तकते थे मिलकर सभी, जब फागुन की राह !! 

होली है नजदीक ही, बीत रहा है फाग ! 
आया नहीं विदेश से ,मेरा मगर सुहाग !!

पिया मिलन की आस मे, रात बीतती जाग ! 
बैठ रहा मुंडेर पर,......... ले संदेसा  काग !! 

छूटे ना अब रंग यह, छिले समूचे गाल !
महबूबा के हाथ का,ऐसा लगा गुलाल !! 

सूखी होली खेलिए, मलिए सिर्फ गुलाल ! 
आगे वाला सामने , कर देगा खुद गाल !!

पिचकारी करने लगी,... सतरंगी बौछार ! 
मीत मुबारक हो तुम्हे, होली का त्यौहार !!

देता है सन्देश यह ,.... होली का त्यौहार ! 
रंजिश मन से दूर कर,करें सभी से प्यार !! 

करें प्रतिज्ञा एक हम,होली पर इस बार ! 
 बूँद नीर की एक भी, करें नहीं बेकार !! 

छोड पुरानी रंजिशें ,....काहे करे मलाल ! 
इक दूजे के गाल पर,.आओ मलें गुलाल !!

सच्चाई के सामने ,........गई बुराई हार ! 
यही सिखाता है हमें, होली का त्यौहार !!

सूना-सूना है बडा, .....होली का त्योहार !
ओठों पे मुस्कान ले, आ भी जाओ यार !!

दिखी नहीं त्यौहार में, शक्लें कुछ इस बार !
थी जिनकी मुस्कान ही, पिचकारी की धार !!


तारीख: 30.06.2017                                                        रमेश शर्मा






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है