चायपिपासु कुतो दुःखम

 

चाय, भारत का प्रमुख पेय पदार्थ है क्योंकि अथक सरकारी प्रयासों के बावजूद भी आमज़न ने इस पर अपना कब्जा बनाए रखा है। लघुशंका और दीर्घशंका की तरह चायशंका को भी बहुत देर तक टालना मुश्किल होता है। चाय की तलब, आपके लब तक चाय को खींच ही लाती है। चाय पीने से पहले दिमाग मे प्रेशर बनता है और पीने के बाद पेट मे। चाय सुड़कते समय मधुर ध्वनि निकालते हुए सप्तम स्वर लगाना भी एक कला है जो पर्याप्त प्रोत्साहन और सरकारी संरक्षण के अभाव में लुप्त होती जा रही है।

 
स्वास्थ्य की दृष्टि से खाली पेट चाय पीना हानिकारक होता है हालाँकि खाली दिमाग ऐसा कोईं खतरा नहीं है। चाय में भले ही कोई पोषक तत्व ना हो लेकिन इसमें समाज के शोषक तत्वों के खिलाफ लीवर और किडनी में जमा फ्रस्टेशन को मुखमंडल के ज़रिए सफलतापूर्वक बाहर धकियाने का माद्दा होता। हर चौराहे पर, चाय की चुस्किया, राजनीती, बॉलीवुड, क्रिकेट और फैशन आदि के चटखारों के साथ रोज़ सलीके के साथ गरबा खेलती है।  चाय के बिना किसी भी मुलाकात में अपनापन और उसका समापन मुश्किल होता है।

सामान्य प्राणी चाय में बिस्किट डूबा कर खाता है लेकिन चाय के एडिक्ट अर्थात "चायडिक्ट" ऐसी किट किट से दूर रहते है। वे तो तो चाय रूपी समुंद्र में अबोध होकर अबाध रूप से गोते लगाते रहते है। समुंद्र मंथन के समय भी ज़ब देवता और असुर, अमृत पाने और पीने के लिए बारी बारी से मगजमारी कर रहे थे तब भी चायडिक्ट लोग तो चाय की चुस्कियों में ही अमृतपान का आनंद दबोच रहे थे। चायडिक्ट लोग ज़ब बीमार होते है तो उन्हें ग्लूकोज़ के बदले चाय की बोतल चढ़ाई जाए तो वे जल्द ही स्वास्थ्य लाभ कर सकते है। ग्लूकोज़ पर "चायडोज़" भारी पड़ता है। जैसे धूम्रपान करने वाले लोग, हर फिक्र को धुंए में उड़ा देते है उसी तरह से चायपिपासु लोग हर दुःख को चाय की प्याली में घोल कर पी जाते है। अतः कहना और कहलवाना उचित होगा कि "चायपिपासु कुतो दु:खम"। चायडिक्ट लोगो के घर पर, पौ फटते ही दूध की थैलिया फटने लगती है। दरअसल यह फटाव ही, ज़न के लिए चाय के सृजन की नींव रखता है। घर हो या दफ्तर, चायडिक्ट प्राणी हमेशा चाय से तर रहने की ताक और अलमारी में रहते है।

एक चाय वाले के भारत का प्रधानमंत्री बनने के बाद भी प्रत्येक देशवासी के लिए चाय पीना अनिवार्य नहीं किया जाना और चायवाद का पर्याप्त प्रचार-प्रसार ना होना, मन की बात ना होकर दुःख की बात है। साम्यवाद, राष्ट्रवाद, समाजवाद की तरह चाय के साम्राज्य का चायवाद के रूप में मेकओवर ना होना चाय के प्रति हमारी अहसानफरामोशी की स्क्रिप्ट लीक कर देता है। एक सभ्य समाज मे चाय के योगदान को घूर कर देखते हुए, हमारा लक्ष्य चाय को राष्ट्रीय पेय का दर्जा दिलाना होना चाहिए फिर उसके बाद भले ही हम उसकी हालत राष्ट्रीय खेल या राष्ट्रीय भाषा जैसी कर दे, उसके बाद पाप नहीं लगता।

चाय के प्रति की दीवानगी को देश की सामूहिक चाय चेतना के रूप में विकसित करना, हर चायपिपासु का कर्तव्य होना चाहिए। पौधारोपण की तर्ज़ पर चाय ना पीने वालों के मुख में "चायरोपण" का कार्यक्रम चलाया जाना चाहिए। चायडिक्ट लोगो को बड़े बड़े वाट्सएप ग्रुप बनाकर, लोगो की चाय चेतना और तलब को धिक्कारना चाहिए ताकि वे अधिक से अधिक चाय गटकने को उतावले और बावले हो। कोई भी उपलक्ष्य हो, हमारा लक्ष्य केवल चाय पिलाना और उससे नहलाना होना चाहिए।

सरकार को भी चायवाद का प्रचार प्रसार करने के लिए कदम और बजट बढ़ाना चाहिए। प्रति व्यक्ति आय के साथ साथ, प्रति व्यक्ति चाय बढ़ाने के लिए सरकार को एक अलग मंत्रालय का गठन करना चाहिए। चाय की खपत बढ़ाने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर लोगो को शपथ और मुफ्त चाय दिलाई जानी चाहिए। दिन की शुरुआत और अंत, चाय से करने वाले परिवारों को सब्सिडी वाला एक अतिरिक्त सिलेंडर सदा, अदा किया जाना चाहिए।

चायसापेक्ष शक्तियो के हाथ, ढ़ाई किलो के बनाने के लिए स्वयंसेवी और परसेवी संस्थाओ को गठबंधन कर जगह जगह चाय महोत्सव का आयोजन करना चाहिए। चाय विरोधी मानसिकता रखने वाले लोगो को "चायसिपता" की तरफ प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें पोलियो की तर्ज़ पर चाय के ड्रॉप्स और इंजेक्शन दिए जाने चाहिए। 
चायडिक्ट लोगो के सामूहिक धतकर्मो से ही हम देश मे सफलतापूर्वक चायवाद अपलोड करके आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर चाय मूल्यों की स्थापना कर सकेंगे ताकि वे कुशलता और सफलता से चाय सुड़क सके।


तारीख: 07.04.2020                                                        अमित शर्मा 






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