खुशी

यह खुशी भुला दी थी मैंने जाने अनजाने में,
कि कहीं कोई मेरी हसरत देखकर इसे छीन ना ले,
कि कहीं अगर फिर जो दरवाजे पर दस्तक हो,
उस गम की आहट को मैं पहचान ना पाऊं,
फिर से आज आई है भूले भटके कहीं,
सोचती हूं कि आंचल से जकड़ कर बांध लूं
या गोद में रखकर सेहला लूं, 
डर है कि इसकी मंजिल कहीं और तो नहीं ।

 


तारीख: 19.07.2021                                                        नुपूर गुप्ता






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है