सुनो चिड़िया

सुनो चिड़िया......

अपनी हर ऊँची उड़ान पर
यह भ्रम मत पालो कि
आसमान तुम्हारा है ।
तुम्हारा यह भ्रम और कुछ नहीं
सिर्फ तुम्हारा भोलापन है ।

तुम्हारी हर उड़ान पर 
वो जो पंखों को कतरने में
लगे रहते हैं और तुम्हारे ही लहू से
आसमान पर लिखते हैं
आसमान हमारा है ।
उनका यह भ्रम और कुछ नहीं
सिर्फ उनका मैलापन है ।।

सुनो चिड़िया.......

मैं तुम्हें उड़ने से नहीं रोक रही हूँ
उड़ना तो तुम्हारा हक़ है ।
उसे वे क्या रोक पाएँगे
जिन्हें स्वयं पर ही शक़ है ।
फिर भी तुम्हें चेताना क्यों मुझे
अपना धर्म सा लगता है ।

तुम्हारे कतरे पंखों में शायद मुझे
अपना मर्म सा दिखता है ।
तुम्हारे कतरे पँखों के जीवाश्म
अवसादों में दबे कहीं मिले थे मुझे ।
आज भी उन्हें मैंने कहीं 
गहरे तहखानों में सँजो रखा है ।।
 
सुनो चिड़िया......

आसमान तुम्हारा नहीं,
पर उड़ानें तुम्हारी अपनी हैं ।
अवसाद तुम्हारा नहीं,
कटे पंखों की जुबानें तुम्हारी अपनी हैं ।
भोलेपन से कहीं दूर,
कुछ तो ऐसा करके दिखाना होगा ।

मद को उनके कर चूरचूर,
उड़ानों की सच का दम दिखाना होगा ।
आसमान उनका भी नहीं है,
इस भ्रम से उनको भी उठाना होगा ।
आओ साथ एक ऊँची उड़ान भरकर आते हैं ।
दम हममें भी है, चलो उनको दिखाते हैं ।।


तारीख: 10.06.2017                                                        डॉ. शुभ्रता मिश्रा






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