काहे को तू आया था?

काहे को तू आया था? क्या लड़ने और झगड़ने को?
या मन तेरा अकुलाया था भवसागर पार उतरने को?
तेरी चाहत की जो थाल सजी, तेरी रूह का एक अरमान न था।
सब ही तेरी लिप्साएँ थी, तेरे प्राणों का सम्मान न था।

तू आया इक अध्याय शुरू, जैसे मिट्टी में बीज पड़ा।
नव देह नया परिवर्तन तू, मानवता का सम्मान बढ़ा।
ले प्रण तू थोडा प्राण बढ़ा, अवसादों का चल मर्दन कर।
बन संघर्ष फिर सृजन गढ़, विचारों में तू प्राण चढ़ा।
इस मानव देह को पाया था, क्या मदिरा का मद भरने को?
या मन तेरा अकुलाया था भवसागर पार उतरने को?

तू होश में आ, सपनों को पी, रूह की असल आवाज को सुन।
भ्रम छोड़ जरा, अस्तित्व को जी, जो सच सा लगे उस राह को चुन।
जीवन का रहस्य बस इतना है कि खुद को ही बस जान ले।
तू ब्रह्म सा है, तू सत्य सा है, सब भूल जा बस इस सत्य को बुन।
तू स्वर्ग छोड़कर आया था, क्या नर्क सा जीवन करने को?
या मन तेरा अकुलाया था, भवसागर पार उतरने को?


तारीख: 18.10.2017                                                        विवेक सोनी






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