आंदोलन पथ पर आज प्रिये आंदोलित होकर देखो तुम

 

लिए काम की क्षुधा आँख में, वे शृगाल देखे तुमने?

मति तुच्छ और मलिन हृदय के, अहं विशाल देखे तुमने?

नहीं देखे यदि, देखो प्रियतम! न्याय सिहरता देखो तुम!

शपथ न्याय की लिए खड़ा, अन्याय विचरता देखो तुम!

 

देखो कि कैसा दिखता था, सैंतालिस से पहले भारत?

पहचानो कैसे दिखते थे, ख़ाकी में लिपटे स्वारथ!

शत्रु कि जिससे कठिन युद्ध कर, छीना था हमने स्वराज!

उसी अरि के मित्र प्रजा पर, हुए आज आरूढ़ सताज!

पुण्यस्मरण में शासन के, आलोलित होकर देखो तुम!

आंदोलन पथ पर आज प्रिये, आंदोलित होकर देखो तुम!

 

देखो कैसे भरे भुवन में, करने को नृशंसता नूतन,

चलती हैं बन्दूक उठाकर, कर्कशता की प्रतिभाएँ!

संसद की सीमा पर सज्जित, शस्त्रों के भीतर निश्चेतन,

बख़्तर भृकुटि तान खड़ी हैं, निर्लज्जता की सीमाएँ!

देखो, सड़कों के आँगन पर, पत्थर कैसे दिखते हैं?

देखो, कैसी मौन पड़ी हैं लोकतंत्र की प्रतिमाएँ!

 

हे मृदे! मार्ग में स्वर्ण खड़ा है, क्षुब्ध हुए संपीड़न से!

क्यों हताश बैठी हो? चिंतित, उत्कट इस उत्पीड़न से!

उत्कट है उत्पीड़न तो, उत्थापित होकर देखो तुम!

आंदोलन पथ पर आज प्रिये, आंदोलित होकर देखो तुम!

 

सर्पों के सरपंचों ने जन-संसद पर विष-तंत्र किया है!

हे मृदा! मुकुट के पुनर्जन्म हेतु षड्यंत्र किया है!

जन-संसद से वृक-समूह को, छिन्न-भिन्न अब करना होगा!

प्रण धारो कि इन सर्पों का समूल नाश करना होगा!

प्रण धारो कि तख़्तों को पद-प्रहार से तोड़ेंगे!

समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे!

 

तिमिरपुत्र ये जन-मंदिर से, अब निष्कासित करने होंगे!

प्राण तजेंगे रण-मग में! ऐसे प्रण भी धरने होंगे!

निज शासन की निज आशा से, आह्लादित होकर देखो तुम!

आंदोलन पथ पर आज प्रिये, आंदोलित होकर देखो तुम!


तारीख: 25.07.2026                                    पुनीत सिंह रत्नु इरशाद




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