मां कैसी होती है

माँ कैसी होती है…

 

मेरी कलम से

 

किस्सा लिख रही हूँ एक स्कूल का,

एक बच्चे की गई भूल का।

जो उसने माँ के संबंध में लिखा था,

“माँ कैसी होती है?”—निबंध में लिखा था।

 

पढ़ाने के लिए माँ को स्कूल बुलाया था,

बेटे की भूल को माँ से ही पढ़वाया था।

भूल यह थी कि उसने माँ से जैसा कहा था,

जो लिखा निबंध में, कुछ ऐसा कहा था—

 

बोला माँ से—

“मुझे तुम कितना सताती हो,

हर बात पर डाँटती हो,

टोकती हो।

कुछ दिनों के लिए क्यों नहीं

दूर चली जाती हो?”

 

यह सुनते ही माँ के होश उड़ गए,

कुछ नहीं बोली, हाथ-पैर ढीले पड़ गए।

कुछ दिनों में ही माँ ने बिस्तर पकड़ लिया,

डॉक्टर ने भी उठने से मना कर दिया।

 

कहा—

“माँ को अभी आराम करने दो,

आप अपने कामों को खुद करने दो।”

 

फिर क्या था—

स्कूल जाने में आज देर हो गई,

अब लगा—माँ क्यों बीमार हो गई?

 

यूनिफॉर्म में भी आज प्रेस नहीं है,

टिफिन में जो रखा है, वह फ्रेश नहीं है।

माँ ने जो काम कर रखे थे आसान,

उन्हीं कामों से हम हो रहे थे परेशान।

 

स्कूल से निकलते ही मन में बेचैनी-सी हुई—

“माँ आज क्या फिर बिस्तर में मिलेगी?

क्यों देर हो गई—भीगी आँखों से पूछेगी?

फिर पास बुलाकर सिर सहलाएगी,

‘आ गया मेरा प्यारा बेटा’—

कहकर गले लगाएगी।”

 

पूछेगी—

“आज स्कूल में क्या खाया था?

पापा ने टिफिन में क्या अच्छा बनाया था?”

 

उसे बस हमारी ही चिंता होगी,

बिस्तर से उठने की कोशिश वह करेगी।

जाते ही मैं मोबाइल नहीं उठाऊँगा,

कल जो देखा था, उसे कैसे भूल पाऊँगा?

 

खेलने के लिए मोबाइल जो उठाया था,

अपनी ही तस्वीरों से उसे भरा पाया था।

मेरी यादों को उसने मोबाइल में रख रखा था,

और मैं नादान गेम के चक्कर में फँस रहा था।

 

मैं भी आज घर जल्दी जाऊँगा,

जाते ही माँ के पैर दबाऊँगा।

यदि पूछेगी—

“पापा ने क्या टिफिन में दिया था?”

बोलूँगा—

“आज सारा काम मैंने ही किया था।”

 

बोलूँगा—

“माँ, मुझसे भूल हो गई,

मैंने इतना सताया,

कि तू बिस्तर की हो गई?

 

माँ, मैं तुझे अब नहीं सताऊँगा,

पर रोटी मैं तेरे हाथ की ही खाऊँगा।

तेरे बनाए खाने की तो अलग बात है,

छप्पन पकवानों में भी कहाँ ऐसा स्वाद है!”

 

आ रहा हूँ माँ, मेरा इंतज़ार कर,

मेरी भूल को माँ, अब तो माफ़ कर।

 

पढ़ते ही आँसुओं का सैलाब आ गया,

सारा स्कूल जैसे उसमें समा गया।

 

माँ ने बेटे को देखा,

कुछ भी न कहा…

बस आँखों से आँसू बहते रहे,

और काँपते हाथों ने

बेटे को अपने सीने से लगा लिया।

 

बेटा भी माँ से लिपटकर रो पड़ा,

आज उसे माँ का मतलब समझ आ गया।

जिसे वह रोज़ की डाँट समझता था,

वह तो माँ का प्यार था।

जिसे वह रोक-टोक कहता था,

वह उसकी चिंता थी।

 

उस दिन बेटे ने जाना—

माँ कभी सताती नहीं,

माँ तो हर पल बचाती है।

माँ की डाँट में भी दुआ होती है,

माँ की चुप्पी में भी ममता होती है।

 

और सच तो यही है—

माँ के होने से घर, घर लगता है,

और माँ दूर हो जाए…

तो अपना ही घर सूना-सूना लगता है।✍🏻 निधि खत्री


तारीख: 31.08.2026                                    निधी खत्री




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