बंजारे-सा जीवन


बंजारे-सा जीवन अपना।
चलते रहना, चलते रहना।

कस्बे-नगर, गली-चौबारे।
पाँव न थमते कहीं हमारे।।
मंज़िल तो है केवल सपना। चलते रहना...

कोई न अपना और पराया।
हमको बाँध सके न माया।।
सुख-दुख मिथ्या, मात्र वंचना। चलते रहना...

सर्दी-गर्मी हो या वर्षा।
अपना मन हर हाल में हर्षा।।
धूप-छाँव-हिम-आतप सहना। चलते रहना...

फूल मिले या शूल भरें हों।
राह में कष्ट भले बिखरें हों।।
सीखा हमने सबकुछ सहना। चलते रहना...

दिल रोया, सपने टूटे हैं।
मधुघट नित हमसे छूटे हैं।।
मन की व्यथा कभी न कहना। चलते रहना...

क्या खोया क्या पाया हमने।
शोक न हर्ष मनाया हमने।।
जो आया है, उसे गुज़रना। चलते रहना...


तारीख: 14.06.2017                                                        डॉ. लवलेश दत्त






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