कशिश

देखी थी कुहुक कोयल की
बुलबुल सा एक तराना था,
पता न था भीतर छुपे बसंत में
ऐसा पतझड़ लग जाना था
एक इशारे पर देख़ो बादलों को मुड़ जाना था
जो पलकें उठकर झुक जाती तो
फिर बसन्त हो जाना था।

बैठकर इसे बिलखता देखूं,
सीने में कुछ सुलगता देखू,
होता ज़िंदा छुपा जख्म जो
मरहम को ललकता देखूं
सुकून मिल जाता उस बेदर्द दर्द में
जो कहते ला सर के लिए कन्धा कर देखूं।


धीरे-धीरे देख भूत,भीतर ये  सुलगती है,
सुबक सुबक कर ये खुद  सीने में खूब धधकती है,
जब बेकाबू हो उन्मादी हो जाती है
तब अश्क़ों में यही पिघलती है
ठण्डी आग मे जलने से बच जाता जो कहती
अकेले में तू भी सिसकती है।

दूर उसका अधूरापन और तुझे पूरा हो जाना था,
अजनबी बनी इन आंखों को एक दिन
एक दूजे में खो जाना था
झुठला आसमा, हाँ उस सितारे को,
तुझेहमेशा को ईद का चाँद बनाना था...

हर मन्नत पूरी हो जानी थी
इश्क़ का फ़साना पूरा हो जाना था,
मुश्किल आसां हो जानी थी
वो तराना पूरा हो जाना था...

..जो उसको तेरा हो जाना था
और तेरा उसका हो जाना था।  


तारीख: 22.06.2017                                                        राम निरंजन रैदास






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