रौनक मेरी महफिलों की कोई और ले गया

रौनक मेरी महफिलों की कोई और ले गया
वो शानो-शौकत,वो फिज़ा, वो दौर ले गया ।


ढलते ही उम्र वो चमक झुर्रियों में बदल गई
मेरे चेह्रे पे टिकती निगाहों का गौर ले गया ।

बागों में टहलना,वो बारिशों में भींगना,भींगाना
वो शाम,वो नदी का किनारा,वो ठौर ले गया ।

तक़नीक और तरक्की तो अमीरों को भा गई
गरीबों की तो रोज़ी,औ खाने का कौर ले गया ।

नाज़ जमाने के उठाते फिरते थे हम शौक़ से
जो कभी सजते थे सर पे वो सिरमौर ले गया


तारीख: 16.10.2019                                                        अजय प्रसाद






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