खो जाए इंसा अच्छा खासा


चकाचोंध और घोर विलासा
खो जाए इंसा अच्छा खासा
जहाँ सम्मोहन की पराकाष्टा
आकर्षण की हो स्वतः चेष्टा


ऐसा शहर जहा लोग पराये
ज़रूरत पड़े तो हो दाएं बाएं
परंतु बढ़तें पग खो जाने को
जो हासिल न हो वो पाने को


गाँव छोड़ सब शहरों की ओर
जहाँ नहीं अब अपनों की ठोर
कहीं सुविधाओं के ठाठबाट
कहीं बिखरा जीवन मन उचाट


तोलमोल की यह मायानगरी
मतलब के सब होते जिगरी
नित ईमान खरीदे बेचे जाते
मन से कुछ बेमन बिक जाते


मूल्य गिराने की हैं कला यहां
बड़ी भीड़ पर एकाकी विरहा
रंग बिरंगी कहीं धुंध कुहासा
आशाये फ़ेरे आये हाथ निराशा
यहाँ हर दूजा हैं ठगा ठगा सा
ये कैसी चकाचोंध और विलासा
खो जाए इंसा अच्छा ख़ासा...


तारीख: 06.04.2020                                                        नीरज सक्सेना






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