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नमस्ते, मैं लिपिका!
कभी-कभी आप ऐसी फ़िल्में देखते हैं जो मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि आपको अंदर तक हिलाकर रख देती हैं। वे आपके आरामदेह सोफ़े को एक बेचैन करने वाले अखाड़े में बदल देती हैं और आपसे वो सवाल पूछती हैं जिनका जवाब आपके पास नहीं होता। डेविड फिंचर की 'फ़ाइट क्लब' मेरे लिए एक ऐसी ही फ़िल्म है। यह कोई एक्शन फ़िल्म नहीं है, यह तो उपभोक्तावाद, आधुनिक जीवन के खोखलेपन और अपनी पहचान खो चुके इंसान के ख़िलाफ़ एक हिंसक, बेचैन और शानदार विद्रोह है।
यह फ़िल्म एक थप्पड़ की तरह है, जो हमें हमारी उस आरामदायक नींद से जगाती है जिसमें हम एक अच्छी नौकरी, एक सुंदर घर और महंगे सामान को ही ज़िंदगी मान बैठे हैं।
कहानी का नायक (एडवर्ड नॉर्टन) हम में से ही कोई है। उसका कोई नाम नहीं है, क्योंकि उसकी कोई पहचान ही नहीं है। वह एक बड़ी कम्पनी में काम करने वाला एक साधारण कर्मचारी है, जो इंसोम्निया (नींद न आने की बीमारी) का शिकार है। उसकी ज़िंदगी का मक़सद बस एक ही है - अपने ख़ाली अपार्टमेंट को IKEA के कैटलॉग से देखकर नए-नए फ़र्नीचर से भरना। वह सपोर्ट ग्रुप्स में जाकर दूसरों का दर्द उधार लेता ताकि कुछ महसूस कर सके। उसकी ज़िंदगी पूरी तरह से खोखली, बनावटी और नींद की गोलियों पर टिकी है।
और फिर उसकी मुलाक़ात होती है टायलर डर्डन (ब्रैड पिट) से। टायलर वो सब कुछ है जो हमारा नायक नहीं है। वह आज़ाद है, ख़तरनाक आकर्षक और व्यवस्था से नफ़रत करता है। वह साबुन बेचता है, फ़िल्मों में अश्लील फ्रेम जोड़ता है, और अमीरों के खाने में पेशाब करता है। वह एक अराजक दार्शनिक है जिसका एक ही सिद्धांत है - आत्म-विनाश ही आत्म-सुधार का पहला क़दम है।
नायक और टायलर मिलकर एक अंडरग्राउंड 'फ़ाइट क्लब' शुरू करते हैं। इसका पहला नियम है: आप फ़ाइट क्लब के बारे में बात नहीं करेंगे। लेकिन यह क्लब सिर्फ़ मुक्केबाज़ी का अखाड़ा नहीं है। यह उन मर्दों के लिए एक शरणस्थली है जिन्हें समाज ने 'अच्छा लड़का' बनना तो सिखाया, पर एक मर्द होना नहीं। वे यहाँ लड़ते हैं, ताकि दर्द महसूस कर सकें, ताकि यह यक़ीन कर सकें कि वे ज़िंदा हैं।
एक थिएटर प्रेमी की नज़र से देखूँ, तो नायक और टायलर एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं, बल्कि एक ही इंसान के भीतर चल रहा एक नाटक हैं। नायक वो है जो हम दुनिया को दिखाने के लिए बन जाते हैं, और टायलर वो है जो हम असल में बनना चाहते हैं - समाज के सारे नियमों को तोड़कर आज़ाद।

यह फ़िल्म उपभोक्तावाद पर लिखा गया एक ख़ूनी घोषणापत्र है। टायलर का एक संवाद इसकी आत्मा है: "जिन चीज़ों के तुम मालिक हो, अंत में वही तुम्हारी मालिक बन जाती हैं।" (The things you own end up owning you.)। फ़िल्म का नायक जब अपना ख़ूबसूरती से सजाया अपार्टमेंट बम से उड़ा हुआ पाता है, तो यह सिर्फ़ एक घटना नहीं, बल्कि उसकी गुलामी की बेड़ियों के टूटने का प्रतीक है।
धीरे-धीरे यह फ़ाइट क्लब एक राष्ट्रव्यापी अराजक संगठन 'प्रोजेक्ट मेहेम' (Project Mayhem) में बदल जाता है, जिसका मक़सद है कॉर्पोरेट अमेरिका और पूरी आर्थिक व्यवस्था को घुटनों पर ला देना। यह विद्रोह पागलपन की हद तक हिंसक और ख़तरनाक है, और यहीं पर फ़िल्म आपसे सवाल पूछती है - क्या आज़ादी पाने का रास्ता हमेशा नैतिक होता है?
डेविड फिंचर एक निर्देशक के तौर पर आपको चैन से बैठने नहीं देते। फ़िल्म का हर फ्रेम बेचैनी और ऊर्जा से भरा है। इसका गहरा, लगभग गंदा सा दिखने वाला रंग, किरदारों के पसीने से तर चेहरे, और टायलर के 'सबलिमिनल' फ़्लैश (पलक झपकते ही दिखने वाले फ्रेम) – यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जो नायक के खंडित हो रहे दिमाग़ का आईना है।
और फिर आता है फ़िल्म का वह ऐतिहासिक प्लॉट ट्विस्ट, जिसने इसे कल्ट का दर्जा दिलाया। मैं उसे यहाँ बताकर आपका मज़ा ख़राब नहीं करूँगी, लेकिन यह सिर्फ़ एक चौंकाने वाला मोड़ नहीं है। यह उस पूरी पहेली का आख़िरी टुकड़ा है, जो बताता है कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन और हमारा सबसे बड़ा मुक्तिदाता, दोनों हमारे ही अंदर बैठा है।
'फ़ाइट क्लब' एक ज़रूरी फ़िल्म है। यह हिंसक है, परेशान करने वाली है, और कई मायनों में विवादास्पद भी। पर यह ईमानदार है। यह आज के उस शहरी इंसान की कहानी है जो सोशल मीडिया पर हज़ारों दोस्त होने के बाद भी अकेला है, और जिसकी पहचान उसके क्रेडिट कार्ड की लिमिट से तय होती है।
यह फ़िल्म आपसे एक बहुत ही असहज सवाल पूछती है - क्या हम अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं, या बस एक अच्छी ज़िंदगी का कैटलॉग इकट्ठा कर रहे हैं? और अपनी असली पहचान पाने के लिए हमें ख़ुद से कितनी लड़ाइयाँ लड़नी पड़ती हैं? यह एक ऐसी लड़ाई है जिसे हम सब कहीं न कहीं, अपने अंदर के 'फ़ाइट क्लब' में रोज़ लड़ते हैं।