
जब मैं पहली बार "दंगल" देखने गया, तब ये सोच कर गया था कि ये महज़ एक स्पोर्ट्स बायोपिक होगी।
लेकिन जब फिल्म ख़त्म हुई, मेरी आँखों में आँसू थे… कंधे तने हुए थे… और दिल में सिर्फ एक आवाज़ थी—“म्हारी छोरियाँ छोरो से कम हैं के?”
यह फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है—महावीर सिंह फोगाट, हरियाणा के एक पूर्व पहलवान, जो भारतीय समाज की सभी सीमाओं को तोड़ते हुए अपनी बेटियों को पहलवान बनाते हैं।
महावीर सिंह (आमिर खान) का सपना था भारत के लिए गोल्ड जीतना, जो वे खुद पूरा नहीं कर सके।
जब बेटियाँ होती हैं तो पहले वे मायूस होते हैं, लेकिन फिर महसूस करते हैं—“गोल्ड लड़का लाए या लड़की, मेडल तो इंडिया को ही मिलेगा।”
वो अपनी बेटियों गीता और बबीता को बेहद कठोर प्रशिक्षण देते हैं:
• 4 बजे की दौड़
• मिट्टी की कुश्ती
• बाल कटवाना
• लड़कों से लड़वाना
• समाज की आलोचना झेलना
लेकिन अंततः वही लड़कियाँ बनती हैं भारत की पहलवान रानियाँ, और गीता कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतती है।
नितेश तिवारी का निर्देशन सादा है लेकिन हृदयग्राही।
उन्होंने न सिर्फ एक स्पोर्ट्स ड्रामा बनाया, बल्कि पितृत्व, पितृसत्ता, नारी स्वातंत्र्य और राष्ट्रभक्ति का समवेत नाद रच दिया।
• हरियाणा की धूलभरी गलियाँ
• मिट्टी के अखाड़े
• लड़कियों की घुटती आज़ादी
• समाज की आँखें
• और अंत में… स्टेडियम में तिरंगा लहराता हुआ दृश्य
हर फ्रेम जैसे देश की नसों में दौड़ता है।
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आमिर खान (महावीर सिंह) – यह शायद आमिर का अब तक का सबसे ट्रांसफ़ॉर्मेटिव रोल है।
उन्होंने सिर्फ अपने शरीर को नहीं, अपनी बोलचाल, चाल-ढाल और सोच को भी महावीर बना दिया।
उनकी आँखे, जिनमें कठोरता और प्रेम साथ-साथ तैरता है, फिल्म की आत्मा हैं।
फातिमा सना शेख (गीता) – गीता की किशोरावस्था से इंटरनेशनल मैट तक की यात्रा को फातिमा ने जैसे जी कर निभाया।
उनकी ट्रेनिंग, बॉडी लैंग्वेज और भावनात्मक ग्राफ अचूक है।
सान्या मल्होत्रा (बबीता) – बबीता की शरारत और गंभीरता, दोनों को सान्या ने बहुत सुंदरता से साधा।
ज़ायरा वसीम और सुहानी भटनागर – छोटी गीता-बबीता के रोल में दोनों बच्चियों ने इतनी कच्ची लेकिन प्रामाणिक ऊर्जा दी कि शुरुआती आधे घंटे में ही दर्शक फँस जाता है।
पियूष गुप्ता, निखिल मेहरोत्रा और नितेश तिवारी का लेखन प्रेरणादायक है, लेकिन ओवरड्रामैटिक नहीं।
“म्हारी छोरियाँ छोरो से कम हैं के?”
“मेडलिस्ट पे तो सारा देश गर्व करता है… पर उसके पीछे जो बाप खड़ा है, उसे कोई नहीं जानता।”
“जो लड़कियाँ आज अपना घूंघट हटाएंगी, कल वो दुनिया हिलाएंगी।”
संवाद स्थानीय होते हुए भी राष्ट्रीय भावना से लबरेज़ हैं।
• “Dangal” – जीत, पसीना और परिश्रम का ध्वजगीत
• “Haanikaarak Bapu” – बेटियों की आँखों से बाप का रौब, लेकिन हँसी के साथ
• “Gilehriyaan” – किशोरावस्था की आज़ादी
• “Naina” – वो भावनात्मक दूरी जो बाप-बेटी के बीच खड़ी होती है
• “Dhakad” – नारी शक्ति का रैप संस्करण
• बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ से कहीं आगे—बेटी को कुश्ती सिखाओ, दुनिया जिताओ
• पितृसत्ता की जड़ता पर चोट
• ग्रामीण भारत में खेलों की उपेक्षा
• महिला खिलाड़ी की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक चुनौती
• पिता-पुत्री के रिश्ते की जटिलता और उसकी जीत
यह फिल्म सिर्फ खेल की नहीं, सामाजिक चेतना की गाथा है।
• राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म
• Filmfare Awards – सर्वश्रेष्ठ फिल्म, निर्देशक, एक्टर (आमिर), डेब्यू एक्ट्रेस (ज़ायरा वसीम)
• Box Office – ₹2000+ करोड़ का ग्लोबल बिज़नेस (भारत की सबसे ज़्यादा कमाने वाली फिल्म बनी चीन में)
• सर्वकालिक प्रेरणादायक फिल्मों में से एक
• आमिर खान ने इस फिल्म के लिए पहले बुज़ुर्ग महावीर का किरदार शूट किया, फिर वजन घटा कर युवा फ्लैशबैक वाले सीन शूट किए
• ज़ायरा वसीम और सुहानी ने 6 महीने की रेसलिंग ट्रेनिंग ली थी
• फिल्म में असली कॉमनवेल्थ गेम्स रेफरी और पहलवानों को लिया गया था
• फिल्म ने हरियाणा में लड़कियों की स्पोर्ट्स एंट्री का आँकड़ा चार गुना बढ़ा दिया
“दंगल” सिर्फ महावीर सिंह फोगाट की नहीं, हर उस पिता की कहानी है जिसने परंपरा से लड़कर अपनी बेटियों को उड़ान दी।
यह फिल्म कहती है
• सपने सिर्फ देखे नहीं, सींचे जाते हैं।
• बेटियाँ सिर्फ घर की ज़िम्मेदारी नहीं, देश की शान हैं।
• और संघर्ष जब स्वाभिमान में बदलता है, तब इतिहास रचता है।
दंगल एक पंच नहीं, एक प्रेरणा है—जो पीढ़ियों तक गूंजेगी।