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जब पहली बार मैंने “इश्किया” देखी, तो मैं कहानी में नहीं, संवादों की नशे में था।
मुझे वो लहजा पसंद आया, जो नफासत के साथ गाली देता है…
वो इश्क़ जो आँखों से नहीं, बंदूक की नोक पर खिलता है…
और वो औरत… जो मर्दों को प्रेम और बदले दोनों का स्वाद चखाती है।
फिल्म की कहानी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति, अपराध और प्रेम के बीच घूमती है।
खालूजान (नसीरुद्दीन शाह) – एक बूढ़ा, शरीफ़ और सीधा सा बदमाश, जिसे ग़ज़लों और पुराने इश्क की तमीज़ है।
बाबू (अरशद वारसी) – उसका भतीजा, रंगीन मिजाज़, लड़ाकों से झगड़ने वाला और बेशर्म दिल वाला।
दोनों एक गैंगस्टर से भागकर विद्या बालन के किरदार कृष्णा के घर शरण लेते हैं, जो अपने पति के आत्महत्या करने के बाद विधवा की ज़िंदगी जी रही है।
लेकिन यह कहानी वही नहीं है जो दिखती है।
कृष्णा की मासूम आँखों में छिपा है एक तूफ़ान—वह दोनों पुरुषों का उपयोग अपने लक्ष्य के लिए करती है, और उन्हें उलझा देती है।
यह एक तीन-कोणीय इश्क, धोखा और रहस्य की कविता है।
अभिषेक चौबे का निर्देशन परंपरागत प्रेम कहानियों से अलग है।
यह फिल्म छोटे शहर की मिट्टी, लहजे, राजनीति और औरत की layered psyche को बहुत शिद्दत से पकड़ती है।
• उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों की सौंधी खुशबू
• संवादों में उर्दू और भोजपुरी का अनोखा मिश्रण
• और किरदारों के ज़रिए जेंडर, वर्ग और अपराध की धार
यह फिल्म आपको गानों से नहीं, माहौल से बहकाती है।

नसीरुद्दीन शाह (खालूजान) – उम्रदराज़ लेकिन रोमांटिक, मासूम लेकिन चालाक।
उनकी शरमाई नज़रें और मीठी जुबान इस किरदार को एक ऐसी ऊँचाई देती हैं, जहाँ उम्र और इश्क़ में फर्क मिट जाता है।
अरशद वारसी (बाबू) – अब तक का शायद उनका सबसे शानदार काम।
उनका उटपटांगपन, मोहब्बत में बेशर्मी और एक देहाती स्मार्टनेस—हर फ्रेम में आग लगा देती है।
विद्या बालन (कृष्णा) – उनका किरदार किसी पवित्र नारी या खलनायिका की परिभाषा में नहीं आता।
वो एक रहस्य है—जो प्रेम भी करती है, और शिकार भी बनाती है।
विद्या की संवाद डिलीवरी, आँखों का काम और किरदार की परतें इस फिल्म की आत्मा हैं।
"प्यार वो रोग है मियां, जो छूता नहीं, लग जाता है।”
"औरत जब तक बिस्तर पे साथ ना हो… कमीनी नहीं लगती।”
"इश्क़ तो दिल से होता है… अक्ल से नहीं।”
"बदले की आग में आदमी खाक हो जाता है… लेकिन सिगरेट बढ़िया जलती है।”
• Dil To Bachcha Hai Ji – ग़ज़ल की मिठास और अधूरी मोहब्बत की चुभन
• Ibn-E-Batuta – मस्ती और बदमाशी का धमाका
• Badi Dheere Jali – रहस्य, औरत और आग का मिलाजुला रूप
• Ab Mujhe Koi – भावनात्मक गहराई
गुलज़ार के बोल—कभी शरारती, कभी आध्यात्मिक, कभी नशीले।
यहाँ संगीत केवल गाने नहीं, किरदारों की भावनाओं का विस्तार है।
• ग्रामीण महिलाओं की agency और शक्ति
• क्राइम और रोमांस का intersection
• सत्ता और पितृसत्ता का खेल
• औरत का "विक्टिम" नहीं, "विजेता" बनकर उभरना
“इश्किया” उस औरत की कहानी है जो मर्दों के बनाए नियमों को उनकी ही बंदूक से तोड़ती है।
• राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – सर्वश्रेष्ठ गायिका (रेखा भारद्वाज – “Badi Dheere Jali”)
• फिल्मफेयर अवॉर्ड्स – क्रिटिक्स बेस्ट एक्ट्रेस (विद्या बालन), बेस्ट डेब्यू डायरेक्टर
• कल्ट फॉलोइंग – छोटे शहरों की ऑडियंस में जबरदस्त असर
• फिल्म ने एक नया genre शुरू किया – Desi Noir Romantic Thriller
• फिल्म का शीर्षक “Ishqiya” एक नॉन-स्टैंडर्ड उर्दू शब्द है, जो इश्क और हुशियारपन का मिश्रण है
• “Ibn-E-Batuta” गाना पूरी तरह गुलज़ार साहब के कल्पना-लोक से निकला था, कोई रेफरेंस नहीं
• फिल्म की ज्यादातर शूटिंग गाज़ीपुर और बाराबंकी के असली लोकेशन्स पर हुई
• विद्या बालन ने अपने रोल के लिए भोजपुरी बोलचाल और देहाती बर्ताव पर महीनों काम किया
“इश्किया” उन प्रेम कहानियों की तरह नहीं है जो गुलाब और चॉकलेट पर टिकी होती हैं।
यह वो इश्क़ है जो गोली, गाली और ग़ज़ल के बीच पलता है।
• मोहब्बत कभी मासूम नहीं होती
• और औरतें सिर्फ प्रेमिका नहीं होतीं—वो रणनीतिकार भी होती हैं
• बदमाशों के पास भी दिल होता है—बस वो “बंदूक के पीछे छिपा होता है”
“इश्किया” एक बदमाश बॉलाड है—जो शायरी में सुलगती है और आख़िर में धमाके के साथ फूटती है।