
नमस्ते, मैं लिपिका!
हम सबने भारत में खेलों पर बनी बहुत सी फ़िल्में देखी हैं। ज़्यादातर कहानियाँ विरोधी को हराने की, मेडल जीतने की और देश का नाम रोशन करने की होती हैं। लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो रिंग के अंदर की लड़ाई से ज़्यादा, रिंग के बाहर की लड़ाई को दिखाती हैं। अनुराग कश्यप की 'मुक्काबाज़' एक ऐसी ही फ़िल्म है। यह सिर्फ़ एक बॉक्सिंग फ़िल्म नहीं, यह ज़िद, जुनून और अस्मिता की लड़ाई की कहानी है। यह उस व्यवस्था के मुँह पर मारा गया एक ज़ोरदार पंच है, जो प्रतिभा को जाति और राजनीति के तराज़ू पर तौलती है।
इस फ़िल्म की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि यह एक साथ दो अलग-अलग रिंग में चल रही लड़ाई को दिखाती है:
• रिंग के अंदर: यहाँ श्रवण कुमार सिंह (विनीत कुमार सिंह) एक बॉक्सर है। उसके पंच में दम है, उसके सपनों में आग है। अनुराग कश्यप के निर्देशन में बॉक्सिंग के दृश्य बेहद यथार्थवादी हैं। यहाँ कोई ग्लैमर नहीं, सिर्फ़ ख़ून, पसीना और हड्डियाँ टूटने की आवाज़ है। आप एक खिलाड़ी के शारीरिक दर्द और उसके समर्पण को महसूस कर सकते हैं।
• रिंग के बाहर: असली लड़ाई यहीं है। श्रवण का असली विरोधी कोई दूसरा बॉक्सर नहीं, बल्कि स्थानीय बॉक्सिंग फ़ेडरेशन का প্রভাবশালী और जातिवादी ब्राह्मण, भगवान दास मिश्रा (जिमी शेरगिल) है। श्रवण एक राजपूत है, और भगवान दास की नज़र में वह एक नीची जाति का लड़का है जिसने उसकी भतीजी (सुनैना) पर नज़र डालने की हिम्मत की है। यहाँ हर क़दम पर एक लड़ाई है - ट्रेनिंग के लिए, एक सरकारी नौकरी के लिए, और सबसे बढ़कर, एक खिलाड़ी के तौर पर सम्मान पाने के लिए।
रिंग के अंदर मारा गया हर पंच, असल में बाहर मिले अपमान और हताशा का ही एक विस्फोट है।

एक थिएटर और सिनेमा प्रेमी होने के नाते, मेरे लिए किरदार ही कहानी की आत्मा होते हैं, और 'मुक्काबाज़' के किरदार अविस्मरणीय हैं।
• श्रवण कुमार सिंह (विनीत कुमार सिंह): इस किरदार और विनीत के अभिनय को अलग करना लगभग नामुमकिन है। यह जानकर हैरानी होती है कि कई सालों से संघर्ष कर रहे अभिनेता विनीत ने इस भूमिका के लिए सालों तक एक असली बॉक्सर की तरह ट्रेनिंग ली और इस फ़िल्म की कहानी भी उन्होंने ही लिखी है। उनका प्रदर्शन सिर्फ़ अभिनय नहीं, एक जिया हुआ अनुभव है। श्रवण ग़ुस्सैल है, ज़िद्दी है, लेकिन बॉक्सिंग के लिए उसका जुनून और सुनैना के लिए उसका प्रेम उसे हमारे दिल के क़रीब ले आता है।
• सुनैना (ज़ोया हुसैन): हिंदी सिनेमा के सबसे मज़बूत महिला किरदारों में से एक। सुनैना बोल नहीं सकती, लेकिन उसकी आँखें और उसके इशारे फ़िल्म की सबसे बुलंद आवाज़ हैं। वह कोई लाचार प्रेमिका नहीं, बल्कि श्रवण के संघर्ष की सबसे बड़ी ताक़त है। उनकी प्रेम कहानी मीठी बातों या बड़े-बड़े संवादों पर नहीं, बल्कि ख़ामोश समर्थन, विद्रोही इशारों और एक-दूसरे को दिए गए भरोसे पर बनी है।
• भगवान दास मिश्रा (जिमी शेरगिल): जिमी शेरगिल इस किरदार में लाजवाब हैं। वह एक ऐसा विलेन है जो डराने के लिए चीख़ता नहीं। उसकी शांत मुस्कान और उसका जातीय अहंकार ही उसकी ताक़त का प्रतीक है। वह उस सामंती और भ्रष्ट व्यवस्था का जीता-जागता चेहरा है, जो आज भी हमारे समाज की जड़ों में गहरी पैठी हुई है।
अनुराग कश्यप की फ़िल्मों में संगीत सिर्फ़ बैकग्राउंड में नहीं बजता, वह कहानी का हिस्सा बन जाता है। 'पैंतरा' या 'मुश्किल है अपना मेल प्रिये' जैसे गाने सामाजिक-राजनीतिक हालात पर एक तीखी टिप्पणी करते हैं। यह संगीत फ़िल्म की विद्रोही आत्मा को आवाज़ देता है।
निर्देशक के तौर पर अनुराग कश्यप ने बरेली की धूल भरी गलियों और उसके किरदारों को पूरी ईमानदारी से परदे पर उतारा है। फ़िल्म देखते हुए आपको लगता है कि आप कोई फ़िल्म नहीं देख रहे, बल्कि उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर की असलियत को जी रहे हैं।
'मुक्काबाज़' एक स्पोर्ट्स ड्रामा से कहीं बढ़कर है। यह एक दमदार प्रेम कहानी है, एक तीखी सामाजिक टिप्पणी है, और मानवीय भावनाओं का एक सशक्त दस्तावेज़ है। यह उस भारत की कहानी है जहाँ प्रतिभा सर्टिफ़िकेट और आरक्षण की फ़ाइलों में दबकर रह जाती है।
यह फ़िल्म आपको तालियाँ बजाने पर नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है। यह पूछती है कि हमारे देश में कितने श्रवण कुमार हैं जिनका सपना खेल के मैदान में नहीं, बल्कि दफ़्तरों की फ़ाइलों और जाति की दीवारों से टकराकर दम तोड़ देता है। 'मुक्काबाज़' एक ज़रूरी और साहसी फ़िल्म है, जो आपको लंबे समय तक याद रहेगी।