
21वीं सदी की राजनीति में अगर कोई चीज़ सबसे स्थायी है तो वह है – कुर्सी से चिपकाव, जिसे मेडिकल साइंस में अब "पोस्ट-पोल कुर्सी सिंड्रोम" कहा जाने लगा है।
परंतु जब अचानक उन्होंने चुपचाप इस्तीफ़ा दे दिया और स्थिति की वजह भी अपना खराब स्वास्थ्य बताया तो सुनकर पूरा राष्ट्र हतप्रभ रह गया। भला कोई खराब स्वास्थ्य की वजह से इतनी बड़ी कुर्सी से इस्तीफा देता है?
कदापि नहीं!
बल्कि उस कुर्सी पर बैठने मात्र से ही खराब से खराब स्वास्थ्य अच्छा हो जाता है।
यह कारण कुछ समझ नहीं आया!
इससे भी ज़्यादा हैरान वे लोग हुए जो वर्षों से उनसे इस्तीफ़ा मांग रहे थे, लेकिन वे दे नहीं रहे थे और आज अचानक बिना मांगे ही दे दिया। बात कुछ हजम नहीं हो रही है।
उनके अचानक इस्तीफा देने से मैं भी बहुत दुखी हूं। दुखी होने का कारण यह भी है कि वे मेरे ही प्रांत से है। कभी कभार मैं दूसरे प्रांत के लोगों को उनकी धौंस दे दिया करता था। अब मैं कैसे दूंगा।इसकी मुझे चिंता सता रही है।
मुझे उन्हें ऐसा करते देखकर रोना आ रहा है। मैं जानता हूं,वे अपने मन से इस्तीफा नहीं दे सकते। निश्चित रूप से उन पर कोई दवाब डाला गया है। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया है, यह बात मेरे हजम नहीं हो रही थी। मैं इस्तीफे की वजह पूछने उनके पास चला गया।
मेरे पूछने पर उन्होंने बहुत ही संयमित शब्दों में कहा —
"राजनीति में हाथी के दांत दिखाने के अलग होते हैं और खाने के अलग।भला मैं इस्तीफा देने और नहीं देने का निर्णय करने वाला कौन होता हूं । जिन्होंने मुझे यहां तक पहुंचाया उनके सिवाय यह निर्णय करने का अधिकार अन्य किसी की पास नहीं हो सकता। निश्चित रूप से मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा था। इसलिए अचानक मेरा स्वास्थ्य खराब हो गया और मुझे इस्तीफा देना पड़ा।"
यह बात उन्होंने माइक के सामने खड़े होकर नहीं, अपितु बंद दरवाजे में कैमरों की अनुपस्थिति में अपने घर पर कही, जहाँ पीछे स्क्रीन पर "संविधान की गरिमा बनाम गरमी की बहस" का स्लाइड शो चल रहा था।
दरअसल वे पिछले कुछ समय से परेशान चल रहे थे। जितनी बार भी वे 'शांति बनाए रखें' कहते, उतनी ही बार कोई पंखा चला देता या माइक तोड़ देता। इस अहिंसात्मक उथल-पुथल से वे बहुत दुखी थे। उनको समझ नहीं आ रहा था। यह सब कौन कर रहा है? कौन उन्हें फेल करने पर उतारू है। यहां कौन अपना है और कौन पराया? किसकी आवाज सुने और किसकी नहीं। लाख कोशिशें के बावजूद भी उन्हें कभी-कभी परायों की आवाज भी सुनाई देने लगी थी। उनकी इस हरकत से उनके अपने परेशान हो रहे थे। वे लाख कोशिश करते कि उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनों की आवाज सुनाई दे लेकिन करें तो क्या करें...।
उनकी आत्मा उन्हें धिक्कार रही थी। उन्हें आत्मा की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। आज जाने क्या हुआ ?
उन्होंने आत्मा की आवाज सुन ली और वे अपने और पराए का भेद भूल गए।
यह आत्मा बड़ी धोखेबाज है ।अच्छे अच्छों को मरवा देती है,उन्हें भी मरवा दिया।भला राजनीति में आत्मा की आवाज पर निर्णय लिए जाते हैं क्या?
उन्होंने भावुकता में ले लिया । उनसे बहुत बड़ी गलती हो गई ।
प्रत्येक गलती सजा मांगती है। जो गलती करता है उसे दंड भोगना ही पड़ता है। उन्हें दंड मिल गया।
राजनीति में हर किसी का एक मॉडल होता है। कोई केजरीवाल मॉडल के चक्कर में बिजली-पानी बाँटता है, कोई योगी मॉडल में बुलडोजर चलाता है। उन्होंने भी अपना अलग मॉडल अपनाया था – किसानों के प्रति सदाशयता। ज़मीन से जुड़ाव ।
हमने तो कसम खा ली है,कभी भी आत्मा की आवाज नहीं सुननी है। सुननी है तो सिर्फ अपने आका की आवाज ।सिर्फ आका की आवाज।