आओ दो शब्द कहे

 

हमारे देश मे कोई भी मंच सिर्फ इसीलिए अपने पैरों और स्पॉन्सर्स के कंधों पर खड़ा किया जाता है ताकि वहाँ से मार्गदर्शन और आशीर्वचनों के प्लास्टिक में लपेट कर दो शब्द प्रेक्षेपित किए जा सके। किसी भी मंच पर मौका-ए-वारदात से दो शब्द बरामद ना होना उस मंच की वैधता पर लांछन का फेसपैक लगा देता है। दो शब्द कभी भी दो शब्दों तक आते आते दम नहीं तोड़ देते है बल्कि वो अपनी साइज के लिए वक्ता के ज्ञान के फीते और शब्दकोश के इंचटेप पर निर्भर होते है। दो शब्द और कुछ नहीं बल्कि वाचाल लोगो की चाल है।


दो शब्दो ने कभी भी डाईटिंग का महत्व नहीं समझा इसीलिए वे "दूधो नहाओ-पूतो फलो" से मुठभेड़ कर बैठे। दरअसल दो शब्द हमेशा अपने कागज़ी आकार तक ही चादर फैलाना चाहते थे लेकिन दो शब्द हमेशा से वक्ता की शाब्दिक  चर्बी की भेंट चढ़ते रहे है। दो शब्दों की मेरुदंड बड़ी लचीली होती है वो ज़रूरत की इलास्टिक के हिसाब से फैलती और सिकुड़ती रहती है। मंचासिन अतिथियो को दो शब्द, अपच की कोख से जन्मी गैस की तरह परेशान करते है,  इसीलिए ज़ब तक वे इसे निकाल नहीं लेते उनके सुख- चैन की "केश ऑन डिलीवरी" नहीं हो पाती है। मुख्य अतिथि कौम से ताल्लुक और प्रखर वक्ता सा लुक रखने वाले लोगो के लिए तो दो शब्द उनके प्राणो और आजीविका का आधार होते है, जिसे पेन से पहले ज़ुबान से लिंक करना होता है। मुख्य अतिथि लोग दो शब्द हमेशा अपनी जेब मे लेकर चलते है ताकि जहाँ ज़रूरत पड़े वहाँ ज़ुबानी जमा खर्च, बिना बज़ट बढ़ाए, खर्च किया जा सके। दो शब्द के मामले में कई लोगो के हाथ, गरीब की जेब की तरह तंग होते है और इसी तंगी के कारण दिमाग उन्हें तंग करता रहता है जिसके चलते उन्हें मुख्य अतिथि लोगो की जेब काटने को मजबूर होना पड़ता है,  जिसमे दो शब्द लक्जरी रूम बुक करके रहते है। आम आदमी, बिलो का भुगतान पेटीएम से करता है ज़बकि मुख्य अतिथि बिलो के साथ साथ दिलो का भुगतान और समाधान,अदद दो शब्दों की मदद से कर देते है। मुख्य अतिथियो के दो शब्द खाने के और तथा दिखाने के और होते है, ठीक उसी तरह जिस तरह से गीले कचरे के लिए हरा रंग का कूड़ेदान होता है और सूखे कचरे के लिए नीले रंग का कूड़ेदान होता है। दो शब्दो की लोकप्रियता को देखते हुए मार्केट में "दो शब्द माफिया" भी सक्रिय है जो प्रशासनिक लापरवाही के चलते दो शब्दों की कालाबाज़ारी कर रहा है।

दो शब्दो से दो दो हाथ करने वाले लोग अभी असंगठित रूप से मार्किट में हाथ-पैर और पार्ट टाइम मक्खियां मार रहे है। लेकिन अब ज़्यादा देर तक आँख और टीवी बंद करके "दो शब्द धारको" की अनदेखी नहीं की जा सकती है। अब समय और फैशन आ गया है कि नेता टाइप लोग जोश और फॉर्म में आकर दो शब्दों के हितों की सुरक्षा के लिए "अखिल भारतीय दो शब्द महासभा" का गठन कर ले। अखिल भारतीय दो शब्द महासभा का प्रमुख कार्य देशभर में दो शब्दो के माध्यम से खुद की सेवा और समाज की हजामत करने वालो की खेप तैयार करना होना चाहिए ताकि समाज दो शब्दों से ज़्यादा उनको कहने वाले का महत्व और मार्किट वैल्यू हिन्दी मे समझे सके। दो शब्द का महत्व बचपन से समझाने के लिए महासभा को विभिन्न शहरों में अपनी शाखाए खोलकर बच्चो के लिए समर वेकेशन के दौरान पल्स पोलियो कार्यक्रम के "दो बूंद ज़िंदगी" की तर्ज़ पर "दो शब्द बंदगी के" वर्कशॉप आयोजित करनी चाहिए।

भविष्य में दो शब्दों की बढ़ती और चढ़ती हुई माँग को देखते हुए अखिल भारतीय दो शब्द महासभा "दो शब्द स्क्रैच कार्ड" भी जारी कर सकती है जिस पर महासभा के गवर्नर के हस्ताक्षर और सील के साथ लिखा होगा, "मैं धारक को दो शब्द अदा करने का वचन देता हूँ।"


तारीख: 07.04.2020                                                        अमित शर्मा 






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