नाच को नहीं आंच

विशुद्ध भारतीय शादियां बिना डांस और दहेज़ के पूरी नहीं मानी जाती है। इसी विशुद्धता से नहाईं हुई एक शादी में, मध्यप्रदेश के एक प्रोफेसर साहब डांसिंग ट्रैक के मध्य में, मस्ती से डांस करते हुए यू ट्यूब और फेसबुक के ठेकों पर आपत्तिजनक अवस्था में बरामद हुए। उनकी इस बरामदगी का खबरिया सूत्रों ने तुरंत संज्ञान और मज़ा लिया। सूत्रों के अनुसार प्रोफेसर साहब, अपने बचपन के दिनों से थिरकने को अंजाम दे रहे है जो अधेड़ावस्था की स्लीपर बर्थ बुक कराने तक जारी है। वायरल होने के बाद भी प्रोफेसर साहब उर्फ डांस अंकल के शरीर में  डांस खतरे के स्थान से ऊपर बह रहा था। अगर उसी समय उनके घर पर सीबीआई या ईडी का छापा पड़ता तो कई टन अनरिकार्डेड डांस ज़ब्त किया जा सकता था।

 

आजकल नाच-गाने की प्रतिभा का खुलासा केवल रियलिटी शो के माध्यम से ही वैध माना जाता है।  लेकिन डांस अंकल ने अपनी डांस प्रतिभा को बिना किसी रियलिटी शो के ही धूप में खुला छोड़ दिया इसीलिए उनकी प्रतिभा पर जुर्माने का टीडीएस काटना चाहिए। डांस अंकल ने अपने डांस को सबसे पहले मीडिया के कैमरे में गृहप्रवेश करवाया जिसके चलते ही वो डाँसप्रेमी जनता के दिलो में घुसपैठ कर पाए।

डांस अंकल, महिला संगीत के मंच से नाचते हुए प्रसिद्धि को प्राप्त हुए है, ज़ब ज़ब ऐसी घटनाएं होती है तब तब देश मे नारीवाद की आवश्यकता बुलेट ट्रेन की गति से महसूस होती है। जब महिला संगीत के मंच से भी पुरुष प्रतिभाए उगने लगेगी तब नारीवाद की ज़मीन बंजर होने से बचाने के लिए उर्वरक मिलना मुश्किल होगा। दुःखद है कि महिला संगीत के मंच से डांस अंकल का विभिन्न कोणों से निरीक्षण करने के बाद भी किसी  नारीवादी का पुरुष विरोधी दृष्टिकोण का बटन चालू नहीं हुआ।

डांस अंकल को 46 वर्ष की उम्र में ही अंकल ठहराया जा रहा है ,अगर वो राजनीती में होते तो 46 की उम्र में भी निशर्त रूप से युवा नेता के पैकेट में फिट कर दिए जाते। डांस करके भी डांस अंकल बढ़ती उम्र को थाम नही पाए, वही अगर वे राजनीती जॉइन कर लेते तो बढ़ती उम्र के बहाव को  ज़न उम्मीदों का बांध बनाकर रोक लेते और खुद नाचने के बजाए दूसरो को  डांस करवाकर पुण्य और इज़्ज़त का खाता जीरो बैलेंस पर खुलवा सकते थे।


नाच में केवल थिरकन ही महत्वपूर्ण नहीं होती है बल्कि नाच को स्वादिष्ट बनाने के लिए एक्सप्रेशन का गरम मसाला भी ज़रूरी होता है, जिसे छिड़कने के बदलने पेंट करना पड़ता है ताकि वो कश्मीर विवाद की तरह स्थाई हो जाए।

डांस भारतवासियों के डीएनए और रियलिटी शो दोनो में समान मात्रा में विद्यमान है। पहले हम मुगलों और अंग्रेजों की धुनों पर डांस लीक करते थे और अब लीक से हटकर चलने वाले नेताओं की धुन पर डांस छोड़ रहे है। साँच की तरह नाच को भी आंच नहीं आती है क्योंकि वो दर्शकीय उत्सुकता का हेलमेट धारण करके चलता है। 

डांस अंकल तो थोड़ी देर नाच कर ही प्रशंसकों के रेफरल से वायरल हो गए लेकिन देश की व्यवस्था तो डीजे बनकर आम आदमी को कितने सालो से ठुमके और हाज़री लगवा रही है लेकिन फिर भी डिजिटल विरोधी रवैया ओढ़ते हुए सरकारो ने आम आदमी को 
 कभी वायरल नहीं होने दिया क्योंकि आम आदमी  दरअसल "मिस्टर इंडिया" है जिसकी नियति में अदृश्य रहना ही लिखा है।


तारीख: 07.04.2020                                                        अमित शर्मा 






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