दिन वो भी क्या थे जब हम ऐसे गांव में रहते थे।


दिन वो भी क्या थे जब हम ऐसे गाँव में रहते थे,
अपनी मिट्टी के स्वाद में हम दीवाने रहते थे।

सूरज से पहले उठना, फिर बड़ों के पैर छूना,
शौच को बाहर जाना, नदियों पे नहाने जाना।
दादी संग मंदिर जाना, मंदिर की घंटी बजाना,
गाय की सेवा करना और गौ माता भी कहना।
हम बच्चे बड़ों के आदेशों का पालन करते थे,
दिन वो भी क्या थे जब हम ऐसे गाँव में रहते थे,
अपनी मिट्टी के स्वाद में हम दीवाने रहते थे।

चूल्हे में आग दबाना, फिर उसी से आग जलाना,
दूध-राबड़ी खाना, पानी भी कुएँ का पीना।
कोई छींके तो रुक जाना, रुककर थोड़ा ही जाना,
घर की घट्टी में ही मिलकर गेहूँ पीसा जाता था।
चिमनी में पढ़ाई करना, पढ़ते-पढ़ते सो जाना,
सावन में पपीहा बोले, कानों में भी रस घोले।
गाँवों में नट के तमाशे, जागा भी पोथी खोले,
आए हरबोले तो फिर वो पेड़ों पर चढ़ जाते थे।
दिन वो भी क्या थे जब हम ऐसे गाँव में रहते थे,
अपनी मिट्टी के स्वाद में हम दीवाने रहते थे।


तारीख: 15.06.2025                                    महेश शर्मा




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